लिखत पोएटिका: मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति

तकलीफों की खोल के गठरी चर्चा करके सो जाना

ऐसा जीना सीधे-सीधे मरना भी हो सकता है

हिंदी फिल्म जगत के मशहूर-ओ-मारूफ गीतकार इरशाद कामिल अपने गीतों से तो खासी शोहरत हासिल कर ही रहे हैं, साथ ही वह ऐसा कुछ भी कर रहे हैं जो यकीनन काबिले तारीफ है।

एक बार उन्होंने कहा था “मैंने समाज से जो कुछ पाया है, अपने चाहने वालों से मुझे जितना प्यार मिला है, उसके प्रतिदान के तौर पर अब मैं समाज को लौटाना चाहता हूं।“ इसी कृतज्ञ प्रतिदान का एक हिस्सा है, चंडीगढ़ और अन्य जगहों पर उनकी संस्था “बेगम बानो फाउंडेशन” की ओर से साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में किया जा रहा महत्वपूर्ण कार्य।

इरशाद कामिल स्वयं भी लब्धप्रतिष्ठित कवि हैं। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से समकालीन हिंदी कविता पर शोध भी किया है।

उनके फाउंडेशन की ओर से चंडीगढ़ में भी पिछले काफी समय से “लिखत पोएटिका” मंच के जरिए साहित्यिक गोष्ठियों का लगातार आयोजन किया जा रहा है और अब इन गोष्ठियों-चर्चाओं का हिस्सा रहे रचनाकारों की कविताओं, गजलों, नज्मों की एक किताब फाउंडेशन ने प्रकाशित की है।

“लिखत पोएटिका – क” (प्रकाशक – पाखी रे क्रियेटिव्स, जयपुर) नाम से आई इस पुस्तक में 95 रचनाकारों की एक-एक रचना शामिल है। इनमें चर्चित नाम भी हैं और नवोदित भी।

संग्रह के शुरू में इरशाद कामिल और तस्वीर कामिल के संबोधन (“कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक”) भी हैं। “कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक” के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि अगर आप किसी बेमिसाल उपन्यास या कहानी को पढ़ने के बाद लंबे समय तक उसकी खुमारी में डूबे रहने की कैफियत से गुजरे हों और उस खुमारी को फिर से जीने की जरा सी भी ख्वाहिश मन में हो तो इन्हें जरूर पढ़ना चाहिए। कविता कहने-सुनने वाले किसी भी शख्स के लिए इन्हें न पढ़ना किसी नियामत से महरूम रहने जैसा होगा। यहां एक-दो उद्धरण ही दिए जा सकते हैं –

“मैं मानता हूं कविता करने के बाद जिंदा रहने की तरकीब है, लेकिन यह तरकीब साधनी पड़ती है, अमर होने के लिए मरना पड़ता है, कविता तप है, एक पल के लिए सुकरात या मन्सूर-अल-हज्ज होने का हुनर है, एहसास है। कविता सिगरेट की तरह नहीं सूरज की तरह जलती है। कविता कांच की तरह नहीं लावे की तरह फूटती है। कविता खून की तरह नहीं दुख की तरह दिल पर जमती है। कविता अमीर खुसरो के पैर में बंधा घुंघरू है, बुल्ले शाह का ‘थइय्या थइय्या’ है, उमर खय्याम की शराब है। कविता लगातार लिखना नहीं बल्कि लिखे को लगातार काटना है, जो आजकल अपने आप को कवि नहीं समझते मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं।”

“कविता के नाम”

“इंतजार कभी-कभी इतना लम्बा होता है कि खत्म होने पर आपको एक अजीब सी उदासी से भर देता है।“

“सूरज इतना ठंडा कभी नहीं लगा। हर चीज जैसे जम सी गई हो। हालांकि यह पंजाब के मलेरकोटला कस्बे की तपती गर्मियों का महीना था। अम्मी जा चुकी थीं। उनकी कब्र के करीब बैठा इरशाद मन ही मन उन्हें वापस घर चलने का आग्रह कर रहा था। समय ने उसके आंसुओं को भी जमा दिया था। तो क्या 1 जून 2010 वह तारीख है जब फाउंडेशन का जन्म हुआ नहीं यह तो सिर्फ वह तारीख है जब फाउंडेशन बनाने का ख्याल जन्मा था।”

“आपको इकबाल मुबारक”

संग्रह में शामिल रचनाएं मानवीय अनुभूतियों की संवेदनशील अभिव्यक्ति के साथ पाठकों को एक व्यापक अनुभव संसार से जोड़ती हैं। इनमें इंसानी रिश्तों और जजबातों की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है और अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक धड़कनें भी।

जिंदगी के पेचोखम को बयां करते हुए इरशाद कामिल अपनी गजल में लिखते हैं –

आग का दरिया धीरे-धीरे कतरा भी हो सकता है

साथ तुम्हारे रहने वाला तन्हा भी हो सकता है

उपभोक्तावाद की अंधाधुंध दौड़ में बेहिस होते जा रहे समाज की मुर्दादिली पर चोट करते हुए वे कहते हैं –

तकलीफों की खोल के गठरी चर्चा करके सो जाना

ऐसा जीना सीधे-सीधे मरना भी हो सकता है

सत्यपाल सहगल अपनी कविता “पिछले पानी में” अवचेतन के गहन कोनों को खंगालने वाले बिंब रचते हैं –

चमकती होगी काई, सांस, लट बालों की

सलवट आंचल की

डूब जाएगा, उतराएगा पहर

पिछले पानी में

जाकिर खान जाकिर ने अपनी गजल में जिंदगी का फलसफा बयान करते हुए लिखा है –

शाम होती है तो हम याद नगर जाते हैं

है शनासाई पुरानी सो उधर जाते हैं

नब्ज ए आलम नहीं रुकती है किसी पल जाकिर

काफिले आते हैं, रुकते हैं, गुजर जाते हैं

स्वानंद किरकिरे की कविता की यादगार पंक्तियां हैं –

रहो के जैसे दिल में रहे धड़कन की धक-धक ताल

रहो के जैसे दिल में रहता है तुमको ना पाने का मलाल

रजनीश अपनी ग़ज़ल में कहते हैं –

धड़कनों से बयां होगी कैफीयत बेहतर

वज्न हर बात का बोल कर नहीं पड़ता

इस कद्र याद पड़ता है अब पता घर का

इस पते पे कोई और घर नहीं पड़ता

अशोक बढेरा की कविता “कुछ पचपन से कम की तुम” बढ़ती उम्र के रूमानी एहसास को बेहद खूबसूरत अंदाज में बयां करती है। वे लिखते हैं –

कुछ पचपन से कम की तुम, थोड़ा पचास से ऊपर का मैं

कुछ पूरी थोड़ी सी तुम, कुछ आधा पौना सा मैं

विजय कपूर की मर्मस्पर्शी कविता “जिन्हें बया नहीं छुट्टी” भी इस अंक में है।

मनुष्य के निराश-हताश मन की पीड़ा बयां करते हुए रजनीश कुमार लिखते हैं –

मेरे ही घर में मेरा जी नहीं लगता

मुझे तो यह यहां का ही नहीं लगता

कोई आहट हवा से हो गई होगी

अब आएगा यहां कोई नहीं लगता

रजत जोशी की लाजवाब गजल पर बरबस ही मन वाह कह उठता है –

तेरी आंखों के डुबाए हुए लोग

क्या करें तेरे सताए हुए लोग

ये उसकी गली से क्यों गुजर रहे हैं

मेरा जनाजा उठाए हुए लोग

कैसे सोएंगे सड़क से पूछो

घर छोड़ के आए हुए लोग

इम्तियाज अली की गजल के कुछ शेर हैं –

बाप को दौलत की खातिर सबने खींचा

हाथ सबके छिल गए रस्साकशी में

आसमान के चांद को देगा चुनौती

एक तारा पढ़ रहा है झोपड़ी में

अंजलि बंगा की पंजाबी रचना “बैठी सब गवा के मैं” के कुछ अविस्मरणीय अंश है

कहिंदे सज्जण पींदा नहीं

वेखां जरा पिला के मैं

नहर विचों चन्न फड़या ए

गलां तेरी विच आ के मैं

दुख तां ओहदा दित्ता है

रक्खा ताले ला के मैं

संग्रह में रश्मि की गजल भी बेहतरीन है। वे लिखती हैं –

एक मुखौटा हंसता हुआ पहना है मैंने

रोज शिकायत में रहता था घर का शीशा

जाने कितने चेहरे ओढ़ लिए हैं मैंने

मुझमें, मुझको ढूंढ के लाता घर का शीशा

वंचितों-मजलूमों को संबोधित पंकज मालवीय की कविता “मेरे देश के गरीबों” राजनीतिक संवेदनहीनता पर तीखा कटाक्ष है।

यों तो मां पर लिखी कविताएं सह्रदय मन को छूती ही हैं लेकिन कहना पड़ेगा कि इस संग्रह में मां पर लिखी कुछ कविताएं अविस्मरणीय हैं।

सपना मल्होत्रा की कविता “बहुत याद आती है मां” की कुछ पंक्तियां हैं –

जब जाती है मां, तो अकेले नहीं जाती

बेटियों के मन की थाह मापने का

पैमाना भी साथ ले जाती है मां

मीनाक्षी वर्मा अपनी कविता “सूना आसमान है” में लिखती हैं –

सोचती हूं, तब क्यों थी इतनी मसरूफ

फुरसत में होकर भी

फुरसत से क्यों थी इतनी दूर

आज तो मां की तेरहवीं भी हो गई

कल तक थी बेपरवाह, बेफिक्र

आज मैं कितनी बड़ी हो गई

मां को स्मरण करती अजय सिंह राणा की कविता “घर की दीवारों पर नमी”, राजेंद्र कुमार कनौजिया की कविता “मां कहती थी” और अरुण सैनी की पंजाबी कविता “मां दे हत्थ” भी यादगार हैं।

राजेश आत्रेय की कविता “खुशी” की पंक्तियां हैं –

कल मिली थी मुझे यूं ही घूमती अचानक से खुशी

मैंने पूछा कैसी हो कहां थीं तुम अब तक छुपी

बोली वह भर के शोखी आंखों की कनेरियों में

देखा कभी मुझे नन्हे से बच्चे की किलकारियों में

रेखा मित्तल अपनी कविता “पुरानी किताबें” में जीवन मर्म को उद्घाटित करते हुए लिखती हैं –

कुछ नाम लिखे बुकमार्क

सुना रहे थे अनकही कहानियां

बलकार सिद्धू की पंजाबी कविता मॉडर्न हीर भी दिलचस्प है।

संग्रह में रवीन्द्र टंडन, कामरान कामिल, मुग्धा अरोड़ा, प्रणव, सुनीत मदान और प्रिशा शर्मा प्रभावपूर्ण अंग्रेजी कविताएं भी हैं। वहीं अनहद, मयंक नारी, परवेज अख्तर, चमन शर्मा, अजरूल हक साहिल और करन सहर की बेहतरीन गजलें हैं। मोहित कटारिया, सुनीता कुमारी, बबीता कपूर, जगदीप सिद्धू, विमल कालिया, सलीम अख्तर, नलिनी चौधरी, प्रसून प्रसाद, कुंदन यादव, सत्यवती आचार्य, विजया सिंह गुरदीप गुल धीर और दलजीत कौर की कविताएं दिल को छूती हैं।

सभी नामों का उल्लेख यहां संभव नहीं है। जो नाम छूट गए हैं, उनकी रचनाओं से भी यह संग्रह निश्चित ही खूबसूरत और पुरअसर बन पड़ा है।

 

♦ हरिंदर राणावत

Posted Date:

September 15, 2025

9:44 am Tags: , ,

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