ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…
बेशक 1957 में आई प्यासा में साहिर लुधियानवी की इन बेहतरीन पंक्तियों को मोहम्मद रफ़ी ने जो दर्द भरी आवाज़ दी और इसे जिस किरदार ने परदे पर जीवंत कर दिया उस गुरुदत्त साहब को आज दुनिया भूल चुकी है… दरअस्ल सिनेमा का वो दौर कब का खत्म हो गया, सिनेमा की परिभाषा से लेकर तकनीक और दर्शक वर्ग तक बदल चुका है… ऐसे में उन गुरुदत्त साहिब की जन्मशती पर उन्हें याद न किया जाना एक युग को नकारने जैसा होगा… गुरुदत्त ने जो फिल्में कीं, जिन कहानियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ परदे पर उतारा, जिन पात्रों को जिया और दुनिया की जिन सच्चाइयों को सामने ले कर आए, वह अपने आप में किसी अंतहीन मिसाल से कम नहीं…. उनके पूरे कामकाज पर , किरदारों पर, फिल्मों के विस्तृत फलक पर जाने माने लेखक और क्लासिक फिल्मों को गहराई तक समझने, परखने वाले प्रताप सिंह ने अपनी किताब सिनेमा का जादुई सफ़र में बहुत विस्तार से लिखा है… प्रताप सिंह ने 7 रंग के पाठकों के लिए गुरुदत्त पर किए गए अपने काम और समालोचना का अहम हिस्सा कुछ नए संदर्भ में भेजा है… पेश है वो तमाम पहलू जो गुरुदत्त को समझने में आपकी मदद करेंगे… प्रताप सिंह का आलेख…
गुरुदत्त और उनकी बेजोड़ फिल्में सचमुच पिछली सदी से अपने चाहने वालों को अपनी गिरफ्त में लिये हुए हैं। ‘कागज के फूल’ और ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ के बीच का शिखर-बिन्दु ‘प्यासा’ ही है, जिनसे इन दोनों फिल्मों की ऊँचाइयों से कम करके नहीं आँका जा सकता। ‘विषाद’, ‘प्रेम’ और ‘आत्मनाश’ का दर्शन ‘प्यासा’ का ही दूसरी फिल्मों में, खासकर ‘कागज के फूल’ में समोया ऐसा बिम्ब है, जो एक दुःखद अतीत से जुड़े ‘पिगमेलियन-प्रेम’ को दर्शाता है। किन्तु ‘प्यासा’ की नियति और आत्महंता-शक्ति उससे भिन्न और सामाजिक-सरोकारों के छल-कपट से विद्रोह का पुरअसर नतीजा भी है। वहाँ तिरस्कार, प्रताड़ना, अवसाद, प्रेम की हार व टूटन और इन सब के घेरे और जीवन के खग्रास से घिरे नायक को किसी ‘देवदास’ या ‘क्रीतदास’ में नहीं बदलते बल्कि, उसका रूपांतरण आत्मघाती घटनाओं के बावजूद प्रच्छन्न-मृत्यु की सुरंग से गुजरने के बाद एक विराट छवि के प्रकाशमान प्रतीक में होता है। आत्मनिर्वासन की राह से गुजरने के बाद उसे और उसके बीच खड़ी दुनिया को मुक्ति का प्रकाश-द्वार दिखलाई पड़ता है, जहाँ से वह एक संजीदा – जमीनी – मसीहा की तरह नारकीय-संसार से विलग होता है और प्रकाश में समाता दिखाई पड़ता है।
इस नारकीय-संसार की संरचना का संजाल कौन बुन रहा है? शायद प्रतिकूल समय की इकाइयाँ उसे हर दौर में रचती हैं। ‘प्यासा’ का बेहद संवेदनशील शायर विजय अपने सभ्य समाज के मुखौटों को बाखूबी पहचानता है। इन मुखौटों में-ऊँचे घराने की बेवफा प्रेमिका मीना, उसके घाघ पतिदेव घोष महाशय, विजय के मक्कार अपने दो सगे भाई, दोस्त श्याम, एडीटर साहब और सुराहीदार गरदन पर शायरी करने की इस्लाह देने वाला एक अदना-सा चपरासी भी है। केवल माँ (लीला मिश्रा), गुलाबो (वहीदा रहमान) और मालिशिया अब्दुल सत्तार (जॉनीवाकर) ही नरक के इस जीवन से उसे तार सकते थे। उसे मरणशील प्रवृतियों से बचा सकते थे। लेकिन उसे बचाता कौन है ? माँ की मौत की .खबर तक देना सगे भाई जरूरी नहीं समझते। ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाइयों से रू-ब-रू कराती उसकी शायरी की कीमत कबाड़ी ‘दस आने’ लगाता है। जिसे उसकी प्रेमिका मीना हासिल नहीं कर पाती। पर उसी शायर विजय की कला [कविता] पर मर मिटी गुलाबो जीवन भर की कमाई से उसे छपवाती है। फिर मीना का प्रकाशक पति घोष उसे छापकर वारे-न्यारे करता है। वही जो एक प्रसंग में– मीना और विजय को अकेले में बात करते देख, तानाकशी में कह चुका है ~~ “ मेरी बीवी और एक बाजारू औरत में कोई फ़र्क नहीं । जबकि अगले ही शाट में वेश्या गुलाबो को, उसका पीछा कर रहे हवलदार से यह कह कर बचाता है कि ~~यह मेरी बीवी है।~~” गुरुदत के सिनेमा का यह जमीनी नजरिया बहुत ही मारक है।
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मुफलिसी ‘प्यासा’ के नायक की पहली दुश्मन है। जमाने और अपनों की उपेक्षा / हिकारत, बदगुमानी ने भी वफा, दोस्ती, अपनेपन सब को ही तो बेमानी बना दिया है। अब इस उपेक्षित महानायक विजय को फ़क़त उसकी शायरी और गलीज-दुनिया में जीने को मजबूर एक वेश्या (गुलाबो) ही गहन – निराशा के अंधकार में भी बचा सकती है, जिससे उसकी मुलाकात अचानक होती है। पुलिस वाले से बचने की जुगत में गुलाबो का उससे चिपटना और विजय का उसे ‘मेरी बीवी’ कहकर सम्बोधित करना कोई फार्मूला अथवा फिल्मी युक्ति नहीं है। सचमुच का संयोग है।
गहन आत्म-साक्षात्कार के क्षणों में ‘प्यासा’ (इसी गुलाबो के माध्यम से) अतिसंवेदनशील नायक की आत्म-पीड़ा और निर्मल-अतृप्ति की बेदाग़ सम्पूर्णता की खोज करने वाली सिने-कृति में रूपायित हो जाती है। इस बेदाग सम्पूर्णता को साहिर की तल्ख-शायरी और गुरुदत्त की निजी कशमकश तथा उन दोनों के रचनात्मक शिखर तथा स्वाभिमान की कसौटी पर खुद यह फिल्म जाँचती / टटोलती है। इसके लिए कहानी में उत्प्रेरक तत्व हर मोड़ पर पहले से मौजूद हैं। नायक की दुश्वारियाँ पहली नजर में उसी की बुनी जान पड़ती हैं। वास्तव में, विषाद और अपमान के घूंट पीने का उसके लिए कोई अंत नहीं है। प्रेमिका मीना (माला सिन्हा), के पति घोष महाशय (रहमान) हर मौके को ताड़ने और एक तीर से दो शिकार करने की फिराक में रहते हैं। छुट्टी के दिन शायरी की महफिल में मीना खुद आमंत्रित शायरों के सामने जाम रखने को तत्पर होती है। तो रहमान (घोष बाबू) का उस क्षण का संवाद उसे तीर-सा चुभता है- “नौकरों-चाकरों के होते , तुम क्यों तकलीफ उठाती हो डियर!” प्रेमिका के साथ नायक मात्र इतने से ही खुद को अपमानित महसूस नहीं करता। इसके बाद के दृश्य में आमंत्रित शायर-मंडली तक उस पर तंज कसती है। उसका अच्छा शायर होना भी मानो एक बड़ा गुनाह है। उसकी शायरी का अपना रंग है। लेकिन शायरी की जवान होती महफिल में “पी भी गए, छलका भी गए” के लहजे से अलहदा शायर विजय का गूँजता स्वर उसकी खुद की दास्तान की नीमबयानी करता है- “जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला !…” इसे सुनकर अवाक् शायरों में से एक का फिकरा भी कम दंश देने वाला नहीं है- “वाह भई ! वाह !! घोष बाबू, आपके यहाँ तो नौकर-चाकर भी शायरी करते हैं।” अपमान का यह घूँट भी नायक चुपचाप पी जाता है और फिर वह हेमंत दा की खनक लिए हुए इस गीत को पूरा कर, सम्भ्रांत खलनायक के दर्प से मानो वह बदला-सा ले चुका होता है। लेकिन वही घोष बाबू अंत में नायक की बरसी का महान प्रपंच रचता है।
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पारिवारिक प्रताड़ना और दुनियादारी के पल-प्रतिपल के मायावी धोखे को बाँहों में समेटे, दुःख का दुशाला ओढ़े गुरुदत्त का यह नायक अकेलेपन और आत्मनिर्वासन की लंबी यातना से बच नहीं सकता था। लेकिन (खुदकुशी के भ्रम – सी) उस घड़ी में जरूर बच निकलता है, जब ठंड में एक भिखारी पर अपना ही चिथड़ाया कोट डालता है और उसे सामने से आ रही ट्रेन की चपेट से बचाने की कोशिश में वह खुद घायल होकर बेहोशी में अस्पताल पहुंचता है । भिखारी ट्रेन की चपेट में मारा जाता है। पर उसका वह कोट भिखारी की देह पर मिलने से विजय के मारे जाने के भ्रम को पुख्ता करता है। वह सबूत ही अब दरपेश है कि इस सदी का तिरस्कृत महान शायर मर चुका है। उसे पागलखाने का रास्ता दिखाने वाले मुखौटे, उसे मुर्दापरस्त साबित कर उसी की मूर्ति का अनावरण कर, उसे शायरे-आज़म के खिताब से नवाजने का ढोंग रच रहे हैं। दिखनोटी – ‘महानता’ और ‘तुच्छता’ का यह ढोंग। यह पाखंड अगले ही क्षण विजय की अकस्मात उपस्थिति से कुछ पल को मटियामेट होता है। ‘प्यासा’ को वही क्षण उत्कृष्टता भी प्रदान करता है। टाउन हॉल के प्रवेश-द्वार पर ‘विजय’ समूची वेदना की पवित्रता के साथ प्रगट होता है। यहीं गुरुदत्त अपने ‘नायकत्व’ के बिम्ब को ध्वनि, प्रकाश और चाक्षुष निर्मलता प्रदान करते हैं। वहीं, उस नायक की कड़वाहट भरी जिंदगी में आए तमाम विद्रूप चेहरे भी उपस्थित हैं। उसके अलग क्लाइमेक्स में ‘प्यासा’ का थीम-गीत परदे पर धीरे-धीरे उभरने लगता है।…मतलबी चेहरों के उस हुजूम को दिखाते हुए साहिर का गीत विजय की मार्फत समाज की सभी परते उघाड़ कर रख देता है ~~~ “ये महलों , ये तख्तों , ताजों की दुनिया / ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है…” / ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है / वफ़ा कुछ नहीं , दोस्ती कुछ नहीं है … ” / जला दो, जला दो, जला दो ये दुनिया / मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया / तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया / ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है… !!” पर विस्मय तो शिखर -क्षण में सब-कुछ बदलता है ! गुरुदत्त के नव-यथार्थवाद का यह कड़ा अन्वेषण और इस गीत का चित्रांकन साहिर की मौजूं शायरी की कड़वी सच्चाई के जरिये नायक को विषाद के अब तक के गहन अंधकार में डुबो नहीं देगा । अंतिम क्षणों तक वह जिजीविषा और जीवन-शक्ति का धारक है, कैसे ? यह चौंका सकता है। कुछ (पर्यवेक्षकों) ने यहां तक मान लिया कि जीवन के नूतन सौंदर्य का सृजन कर, अपने हिस्से के नवप्रभात में ही उसे बदलना था। शायद इसी भलामे में, नायक को पलायनवादी होने से और आत्मविनाश की सघन-छाया से अंत में बचा भी लिया गया हो। क्या दुर्दशाएं ऐसा होने देंगी कभी ?
किन्तु ‘प्यासा’ का प्रत्यक्ष यथार्थ जिस ऊँचाई को छूता है उसकी तह में सफलता के शिखर नहीं, असफलता और अतृप्ति की ही कड़वी और दिव्य अनुभूतियाँ हैं। जिन्हें गुरुदत्त ने अपने चेहरे की मौलिक उदासी और आँखों की खुमारी और खालीपन से भी प्रदीप्त होने दिया है। शायद मीनाकुमारी के बाद गुरुदत्त ही ऐसे अभिनेता हैं, जो मन की टूटन को और रूमानियत तथा अधूरी रह गई तन-मन की प्यास को भी अपनी बोलती आँखों और होठों से पूरी शिद्दत से जाहिर होने देते हैं। उनकी आत्मीय छवि और दिल की गहराइयों से उठ रही लौ-लपट में मन के अंधकार से बाहर झाँकने की अबूझ-सी तन्मयता मौजूद रहती है। ‘प्यासा’ का नायक अपनी उदासी में यौवन के ताप से बीमार व्यक्ति की वेदना के मौन-चीत्कार का प्रतीक भी है, जिसका अपना साया तक बेजार है। बावजूद इसके वह इसी ‘तुमुल-कोलाहल-कलह’ में साहिर की तल्ख शायरी की दबी आग से अँधियारे कोने जगाता / दिखाता चलता है- ‘सना-ख्वाने-तसदीके मशरिक कहाँ हैं ?’ नज़्म का एक सरल पाठ उसकी होशमंदी और बाकी दुनिया की गैरत को पेश करता है- जिन्हें नाज है हिन्द पर… वो कहाँ हैं…?
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इस मंजर तक आते-आते आत्म-प्रवंचनाएँ पीछे छूट जाती हैं। हृदय के सूने कोने में कोई नहीं है अब। टाउन हॉल के कोलाहल और प्रकाश के बीच जैसे इस विराट शून्य का रचयिता ही आकर खड़ा हो गया है। दिल में चुभी अनेक फांस लिए ! विसर्जन की ललक लिए !! गुरुदत्त के भटकाव को एक सही दिशा मिलती है जब गुलाबो के साथ वह मुक्ति के प्रवेश द्वार से किसी पारलौकिक दुनिया के अभिसरण पर निकल जाता है। परदे पर अपने से भी परे जाता हुआ एक अपनजन .. महानायक उभरता है।
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गुरुदत्त के नायक का यह अपने (संसार) के (छल-कपट से) भी परे जाना, दिखाना पारलौकिक अभिसरण सा ही लगता है। वास्तविकताओं ने उसे छला था। जो विजय को अवांगार्द-शैली में भटकाता रहा और फिल्म का अंत-‘प्यासा’ को मंजिल हासिल न करने वाले नायक की किसी ख्वाबगाह में छोड़ गया है।
लेकिन क्या विजय (गुरुदत्त) को किसी सात्विक-सहचरी का निकस (मार्ग) हासिल हुआ अपने नायकत्व का मिथ्या-जगत से नाता तोड़ कर ? वह भी गुलाबो (वहीदा रहमान) के सहारे (क्रॉस) पर टिकी उसकी आत्मा भी, धवल वस्त्रों में भी बेचैन ही रही। ‘प्यासा’ को गुरुदत्त की इस दीवानगी से मुक्ति नहीं मिली। किंचित्, कुछ समीक्षकों ने इसे दूसरे नजरिये से भी देखना परखना शुरू किया और उसे ‘ईसाईयत’ (के विश्वास) से भी खंगाल कर इसके खरे-खोटेपन की जाँच की। फिल्म समीक्षक ब्रजेश्वर मदान ने अपनी विश्लेषणपरक गहरी सोच से इस जाँच के निष्कर्षों की आभा में ‘प्यासा’ के कथित ‘एलोगरीकल फार्म’ की .खबर ली। मृत्यु की सब तरफ फैली सनसनी के बाद अपनी ही बरसी वाले समारोह में विजय का “लार्जर देन लाइफ़” लौटना क्या है? इसे मदान के नजरिये से जानने में हलकी-सी ही मदद मिलती है? उनका यह नजरिया बाद में खुद ही ‘धर्म’ और ‘नायक पूजा’ की परिभाषा में क्यों तब्दील हो गया ? शायद गुरुदत्त पर धार्मिक-बिम्बों का कोई प्रतिगामी हमला-सा ना लगे। इसलिए वे (मदान) प्रगतिशील लबादे में खुद भी लौट गए।
बहरहाल, मदान की यह सोच ‘कोट’ किए जाने लायक तो है ही। बरसी पर (विजय का) लौटना- *1) “निश्चय ही यहाँ चर्च का बिम्ब है लेकिन क्या इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि गुरुदत्त यहाँ धर्म के इस्तेमाल के बारे में बता रहे हैं।…” अलबत्ता मदान अपनी थ्योरी पर भी लौटते हैं*2) जिस रूप में प्यासा को ‘ईसाई- विश्वास’ की फिल्म सिद्ध किया गया ‘, उस से भी फिल्म की अहमियत कम नहीं होती। ‘समाज को भीड़ में बदलने’ के इकबाल मसूद के आख्यान की टेक पर मदान की यह ‘थ्योरी’ गढ़ी गई होगी जिनका उन्होंने जिक्र पहले ही कर दिया है।
गुरुदत्त की बिम्ब-संरचना पर मदान खुद भी सवाल उठाते हैं। लेकिन इन्हें प्रतिगामी या प्रगतिशील के खांचे में रखकर ‘बिम्बों के इस्तेमाल’ पर प्रश्नचिह्न लगाने के बजाय फिल्मकार से सरोकार पर सीधे बात होनी चाहिए थी। गुरु दत्त की मंशा क्या रही होगी, इसे इकबाल मसूद से लेकर नसरीन मुन्नी कबीर तक सबने भाँपने की कोशिश की। मसूद भी नारमन मेलर की टेक लेते हैं। पर इसे अपने ही समाजशास्त्रीय तौर-तरीकों से समझना – समझाना बेहतर होता।
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दर’सल गुरुदत्त ‘आत्मनाश’ का मौलिक दर्शन ही रचते हैं। जो उनके दुःखान्त के ओर-छोर पर टिका है। वहाँ। जहाँ ‘प्यासा’ इस’ आत्मनाश के दर्शन’ के आत्म-साक्षात्कार की टोह लेती है, नायक एक अनजान जगह (ख्वाबगाह) लौटकर अदृश्य हो जाता है। पता ही नहीं चलता कि नायक विजय गुरुदत्त के बोहेमियन-मिजाज और जीवन-शैली से मुक्ति की ललक में तमाम लीलाओं से परे हो गया है। उसकी यह नई छवि दुःखद अतीत के अंधकार को प्रकाश की तरह चीरती है। लेकिन क्या दर्शक की मनोचेतना तब एक प्रतिनायक के पलायन और विलक्षण मौन में डूबने को तैयार (सहमत) थी ? अथवा उसकी अन्य मनो-स्थितियों को पहचानने या उनमें बदलाव के क्षणों को जान पाने का माद्दा रखती थी ?
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किसी सजग मूर्तिकार का सा ‘कागज के फूल’ और ‘प्यासा’ के इस शिखर-पुरुष का ‘पिगमेलियन प्रेम’ इसी कारण परदे पर पिट जाता है। ‘हिट’ होता है सिर्फ जज़्बा ! ‘प्यासा’ को ही लें वह ‘हिट’ इसलिए भी होती है क्योंकि उसके पूर्वरंग में छाई रही— विरह-वेदना की आँच दर्शक की आत्मा की अगन को भी ‘इंटरवल’ से पहले ही जगा चुकी होती है और उसका आंतरिक तनाव एवं ताप मन-मस्तिष्क पर अंतिम दृश्यों के करुण-काव्य में तब्दील होने से पहले तक बना रहता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि इस ‘करुण-काव्य’ में तब्दील हुए अंत ने दर्शक की सांसारिकता को कोई झटका नहीं दिया होगा। निश्चय ही ऐसा हुआ और दर्शक गुरुदत्त के पक्ष में खुद भी उस अदृश्य-प्रतीक की काया में एक पल के लिए ही सही, समा गया होगा । थिएटर से बाहर आने पर वह (दर्शक) इस प्रतिनायक के पोस्टर के सामने विनत भी हो गया होगा अथवा साहिर के गीतों में छिपी उसकी वेदना से खुद भी अरसे तक गफ़लत में रहा होगा। यही गुरुदत्त और ‘प्यासा’ के दर्शन की कामयाबी का गुणसूत्र है।
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इसे भी नहीं नकारा जा सकता कि “प्यासा” की आत्महन्ता-शक्ति नियति और सांसरिकता से टकराने का माद्दा रखती है। छल-कपट उसके आत्मीय भावलोक का अपहरण करते हैं तो निःशेष होकर भी नायक अपने विद्रोह की अमिट छाप मनोजगत पर छोड़ जाता है। गुरुदत्त का यह ‘लोक’ (परिवार, चाहत, बदहाली) अपने नाश की विवेचना के खेल से पहले कैसा रहा होगा? इसे उनके अपने जीवन में टटोलने की जरूरत नहीं है। उनकी सराही गई फिल्म “चौदहवीं का चाँद” के असलम और नवाब के संवादों में गुरुदत्त की स्वीकारोक्ति भी इस गैरत-बेगैरत हालत का बयान कर देती है। असलम (गुरुदत्त) का संवाद है- “इतना उलझ गया कि वहीं का.. वहीं पहुँच गया।.. ” रहमान (नवाब) इस वाक्य को पूरा करता है- .. “और मंजिल कभी नहीं मिली।”
दूसरा संवाद है- ‘यह दीवानों सी हालत क्यों बना रखी है… ? नबाव (रहमान) को असलम (गुरुदत्त) जवाब देते हैं-“सब किस्मत का खेल है।”… “साहिब बीवी और गुलाम” के अक्स में भी ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ के गुरुदत्त इस किस्मत के खेल को एक नयी ऊंचाई प्रदान करते हैं और अपनी जिंदगी से जुड़ी अपनी चंद फिल्मों के प्रतिबिंबित अक्स के साथ हमारे भीतर दाखिल हो जाते हैं। लेकिन इससे जुदा अक्स ‘प्यासा’ की 1957 की प्रीमियर-पार्टी में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक संपत लाल पुरोहित जी को साफ दिखाई पड़ता है। उस अवांतर-प्रसंग को भी यहां प्रस्तुत करने का मन है। इसे उनके ‘जनसत्ता’ के 12.5.2005 को शाया हुए चर्चित कॅालम से साभार दे रहा हूँ । इस मौके पर वहां की ‘प्रेस’ को भी निमंत्रित किया गया था । दिल्ली के फिल्म-वितरक की ओर से चेम्सफोर्ड क्लब में हुए उस शानदार आयोजन का आँखों देखा हाल-सा वर्णन पुरोहित जी ने क्या खूब किया है अपने कॅालम—“मेरी नजर से” की रहगुजर में! .. .. .. .. ..
नई दिल्ली में 1957 में एक अत्यंत भव्य और सौम्य प्रेस कांफ्रेंस हुई थी। गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ की रिलीज के मौके पर चेम्सफोर्ड क्लब में। ‘प्यासा’ के दिल्ली वितरक बी.एम. शाह ने गुरु दत्त और उनकी यूनिट से मिलने के लिए प्रेस को भी आमंत्रित किया था। गुरुदत्त काली अचकन और सफेद चूड़ीदार पाजामे में थे। सिर पर पीछे से उनको बाल हलके हो रहे थे। वहीदा रहमान हरी साड़ी में अपने साँवले रंग में दमक रही थी। नशीली आँखें और कमनीय सौम्य चेहरा ! अब “प्यासा” के दिल्ली में खुलते पहले शो में दर्शकों में फिल्म के प्रति पर्याप्त उत्साह नजर नहीं आ रहा था, लिहाजा, गुरुदत्त की टीम के चेहरे पर चमक कम थी । तो भी, जैसा कि सुना-पढ़ा था, गुरु दत्त और वहीदा रहमान के बीच प्यार चरम सीमा पर था। (उन्हें) उनकी नजर से चुराकर देखा कि जब वहीदा और गुरु दत्त एक-दूसरे को देखते थे तो ऐसा लगता था जैसे दोनों एक दूसरे को आँखों में समा जाना चाहते हैं। इस पल वहीदा रहमान का यह इनकार, कि उन दोनों के बीच गुरु-शिष्या के अलावा कोई रिश्ता नहीं, झूठा मालूम पड़ रहा था। जो हो, यह फिल्मी पार्टी अत्यन्त शान्त वातावरण में चल रही थी, उसे तोड़ा एस०डी० बर्मन की अनूठी आवाज़ ने ! किसी ने सचिन दा से संगीत के बारे में सवाल किया था और सचिन देव बर्मन इस पर चहक उठे। उन्होंने सफेद धोती-कुर्ता पहना हुआ था और कान को हाथ लगाकर एक के बाद एक रागिनियों की रंगत पेश कर रहे थे। सचिन दा के प्रदर्शन के बीच गुरु दत्त और वहीदा के चेहरे पर सब निगाह गढ़ाए हुए सचिन दा की धुनें सुन रहे थे। वहाँ उपस्थित लोगों के लिए यह अलौकिक क्षण था। जो हो, ‘प्यासा’ अपने संगीत और शायरी व कथानक के कारण बेहद सफल भी सिद्ध हुई। यह शाहकार हिन्दी सिनेमा की सचमुच एक अविस्मरणीय कृति है।
‘जनसत्ता’ में छपे 2005 के इस अवांतर-प्रसंग के सालों बाद अखबारों में यह भी छपा कि गुरु दत्त अभिनेत्री वहीदा रहमान के दूसरे बैनर की फिल्मों में काम करने के कारण आहत हुए थे। स्टूडियो सिस्टम के उस दौर में दूसरे बैनर की फिल्मों में [सशर्त बंधे होने के कारण] काम करने की मनाही थी। यह मामला “मुझे जीने दो” फिल्म से वहीदा जी के जुड़ने का बताया जाता है। उस फिल्म को करने पर अडिग वहीदा जी को गुरु दत्त कड़ी नाराजगी के बाद (सेट पर पहुँच भी) रोक नहीं पाए। आपसी दूरियों की इस पहल .. इस घटना के तीन साल बाद गुरु दत्त गुजर गए थे। जाहिर है उनकी मौत या उनके अवसाद से इस अलगाव का कोई सीधे संबंध नहीं रहा।
दूसरी तरफ, अंत में “प्यासा” का नायक अदृश्य में जाने की अपनी तैयारी के तार बुन रहा है। पर अकेले नहीं ! यह चाहत ‘दिल के रास्ते से’ होकर जाना चाहती होगी । ‘देह प्रेम की जन्मभूमि है’।*3) ‘ पर इसे गुरुदत्त के संदर्भ में रोमानियत से भी परे जाकर पहचानना और उसे किसी पारलौकिक खुशबू की तरह पाना होता है। ‘प्यासा’ के अंतिम दृश्य के कुल जमा तीन संवाद इस मनःस्थिति में ‘लौटने’ या ‘खो जाने’ का तकाजा बयान करते हैं। साथ ही, अदृश्य प्रकाश के इस धवल धुँधलके में प्रवेश से पहले गुरुदत्त किस प्रेमिल-(मन) का इंतजार कर रहे थे ? उसके तार वो भी उनकी खुद की जिंदगी से ही जुड़े थे। जो एक सद्गृहस्थ फिल्मकार की लीलाओं में काल्पनिक रह गया, उसे ‘प्यासा’ में जी लिया गया और फिर अंतिम आमंत्रण की बेला आ ही गई।
विजय : मैं जा रहा हूँ-गुलाब !
गुलाबो : कहाँ ?
विजय : बहुत दूर जा रहा हूँ
गुलाबो : बस यही कहने आए थे ?
विजय : साथ चलोगी ?
“प्यासा” फिल्म की यह सादगी ही संवादों की मखमली-उड़ान में इतना कुछ कह गई है कि बाकी कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
संदर्भः
1 ) ‘सिनेमा नया सिनेमा’ : (पृष्ठ 8 और 9) लेखक : ब्रजेश्वर मदान ।
2 ) ‘सिनेमा नया सिनेमा’ : पुनः (पृष्ठ 8 और 9) लेखक : ब्रजेश्वर मदान।
3 ) ‘उर्वशी’ में ‘दिनकर’ का काव्य-कथन।
प्यासा को लेकर कुछ ऐतिहासिक संदर्भ…
‘प्यासा’ से पहले और उसके बाद
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“प्यासा” के निर्माण से बारह साल पहले ही गुरुदत्त ने इसकी कहानी लिख दी थी। शीर्षक था-‘कशमकश’ । इसकी ‘थीम’ नार्वेजियन लेखक नट हैम्सन की किताब ‘हंगर’ से उत्प्रेरित है।
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गुरुदत्त इसके निर्माण की शुरुआत से संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने संपादित चार रील नष्ट करना मुनासिब समझा। ऐसा ही किया गया।
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ऋत्विक घटक के साथ फ्रांस में गुरुदत्त के सिनेमा को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।
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‘देवदास’ कर चुके दिलीप कुमार ने ‘प्यासा’ की पेशकश ठुकरा दी थी। मीना की भूमिका मधुबाला नहीं कर पाईं तो माला सिन्हा का चयन किया गया। ‘प्यासा’ ने उन्हें स्टार बना दिया और फिर राजकपूर के साथ भी उन्हें भूमिका निभाने का मौका मिला।
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निराशावादी अंत से बचने के लिए गुरुदत्त ने अकेले नायक की अंतर्यात्रा में वेश्या गुलाबो (वहीदा) को शामिल किया था। वहीदा जी के ‘इन्वाल्वमेंट’ ने गुरू और गीतादत्त की नियति को उलझा दिया था।
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आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने पहले-पहल ‘गुरुदत्त : ए लाइफ इन सिनेमा’ वर्ष 1996 में प्रकाशित की। इसकी लेखिका हैं-नसरीन मुन्नी कबीर, जो इंग्लैंड में रहती हैं और वहाँ के चैनल- 4 के लिए कार्यक्रम पेश कर चुकी हैं।
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अरुण खोपकर की कृति — ‘गुरुदत्त : तीन अंकीय त्रासदी’ उनकी फिल्मों को नए नजरिये से प्रस्तुत करती है। शायद यही उनके सिने-जीवन और निजता की आईनगीरी करने वाली श्रेष्ठ पुस्तकों में है।
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इस्मत चुगताई उन पर एक उपन्यास ‘ अजीब आदमी ‘ पहले ही लिख चुकी हैं। इसके अलावा मराठी में अंजन कुमार की एक उपन्यासिका ‘ आमेन ’ गुरुदत्त और मीना कुमारी की जिंदगी के अफसानों पर शाया हुई। इसका हिन्दी-पाठ प्रकाश भातंब्रेकर की कलम से रचा गया।
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‘ प्यासा- चिर अतृप्त गुरुदत्त ‘ प्रहलाद अग्रवाल की कृति प्रकाशित हुई, जो रोमानियत की नए ढब से पड़ताल करती है।
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महेश भट्ट ने बचपन में “प्यासा” ऐसे थिएटर में देखी जहाँ टिकट नहीं होती थी, बल्कि हथेली पर मुहर लगाई जाती थी। ‘प्यासा’ देखने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कमबख्त, हथेली पर मुहर का छापा तो मिट जाएगा कुछ ही दिनों में। लेकिन माला सिन्हा की मीना में छिपी ऐंद्रिकता और आसक्ति की छाप तो अमिट है। उसे भुलाना मुश्किल होगा।
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‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ को ‘टाइम’ पत्रिका ने सार्वकालिक महान फिल्म का दर्जा दिया।
Posted Date:July 17, 2025
4:48 pm Tags: प्यासा, गुरुदत्त, गुरुदत्त जन्मशती, काग़ज़ के फूल, साहिब बीवी और गुलाम