पद्मविभूषण से सम्मानित प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गंगू बाई हंगल ने 1932 में जब पहला गाना रिकार्ड करवाया था तब एच एम वी ने उंनको एक पैसा भी नहीं दिया था। यह बात प्रसिद्ध संगीत विशेषज्ञ एवं जीवनीकार इरफान ज़ुबैरी ने कुमार गंधर्व स्मृति व्यायख्यान देते हुए कही। ज़ुबैरी इन दिनो रज़ा फाउंडेशन के लिए प्रख्यात शास्त्रीय गायक मल्लिकार्जुन मंसूर की जीवनी लिख रहे हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाज शास्त्र से एमफिल करनेवाले और त्रुएंबिन यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर चुके ज़ुबैरी आगा खान कल्चरल ट्रस्ट और इंदिरा गांधी सेंटर फॉर आर्ट में मुख्य अनुसंधान सलाहकार हैं।
कर्नाटक के हुबली में 5 मार्च 1913 को जन्मी गंगू बाई एक दलित परिवार की थीं और अपनी प्रतिभा के बल पर बीसवीं सदी में देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में एक बनीं। भारत सरकार ने उनपर एक डाक टिकट भी जारी किया।
रज़ा फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस समारोह में ज़ुबैरी “भारतीय शास्त्रीय संगीत :सृजनात्मक एवं औद्योगिक दृष्टि से मूल्यांकन “ विषय पर भाषण दे रहे थे। फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने कार्यक्रम के शुरु में बताया कि यह सातवां कुमार गंधर्व स्मृति व्याख्यान है और अब तक मुकुंद लाठ समेत 6 विद्वान इसमें भाषण दे चुके हैं।
उन्होंने कहा कि आम तौर पर संगीतकार सार्वजनिक रूप से कम बोलते हैं। वे निजी तौर पर जरूर कुछ कहते हैं। एक बार मराठी के प्रख्यात कवि वृंदा करींनदकर् की बड़े गुलाम अली खां से मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि मौसिकी मूरत जैसी होती है यानी बोलती नहीं है लोग उसे महसूस करते हैं। उन्होंने बताया कि ज़ुबैरी लंबे समय से मल्लिकार्जुन मंसूर की जीवनी लिख रहे हैं लेकिन दिक्कत यह आ रही है कि मल्लिकार्जुन के परिवार वाले उनकी एक तस्वीर के लिए 6 हज़ार रुपए मांग रहे हैं इसलिए इस जीवनी को छापने में मुश्किल हो रही है। रज़ा फाउंडेशन एक एनजीओ है उसके पास इतने पैसे नहीं लेकिन कोई बीच का रास्ता निकाला जा रहा है।
गंगू बाई हंगल
ज़ुबैरी ने बीसवी सदी के आरम्भ में ग्रामोफोंन रिकार्डिंग के इतिहास पर रौशनी डालते हुए बताया कि पहले शास्त्रीय संगीत के कॉन्सर्ट नहीं होते थे। ये राजे रजवाड़ों की महफिलों और बैठकी में गाने बजाने की चीज़ थी जिसके कद्रदान कुछ खास लोग होते थे। लेकिन जब हिज मास्टर्स वॉइस को इन गानों की चर्चा से जब उसका बाजार दिखा तो उन्होंने भारत मे 1902 में रिकार्डिंग शुरू की पहले कलकत्ता की दो गायिकाओं शशिमखी और फणी बाला की रिकार्डिंग हुई लेकिन वे बहुत खराब थीं बाद में गौहर जान की रिकार्डिंग हुई जो पहली रिकार्डेड गयिका बनीं।
उन्होंने कहा कि जब गंगू बाई हंगल की रिकार्डिंग का आफर मिला तो एचएमवी ने एक अनुबंध किया लेकिन इस बीच गंगू बाई की माँ नहीं रहीं। बाद में उन्हें मुम्बई जाकर गाना रिकार्ड करवाना पड़ा तो उन्हें कम्पनी ने होटल में ठहराया, आने जाने का खर्च मिला, मुम्बई दर्शन भी मुफ्त में कराया गया लेकिन कम्पनी की ओर फीस के रूप में एक पैसा नहीं मिला। इतना ही नहीं पलुस्कर साहब को भी रिकार्डिंग का पैसा नहीं मिला।
ज़ुबैरी ने बताया कि शास्त्रीय गायिकी का तीसरा चरण रेडियो का शुरू हुआ जो पहले चेन्नई में रेडियो क्लब और फिर लाहौर रेडियो से दो घण्टे के प्रोग्राम से शुरू हुआ। फिर 1932 में दिल्ली रेडियो से लेकिन तब रेडियो की फीस अच्छी नहीं थी। उन्होंने बताया कि मौसिकी का चौथा दौर पब्लिक कॉन्सर्ट से शुरू हुआ तब उसके एजेंट ये समारोह करवाते थे लेकिन बाद में इसके कारपोरेटीकरण से यह इवेंट में तब्दील हो गया और मीडिया तथा कारपोरेट ने इन गायकों को सेलिब्रेटी बना दिया। कलाकार हर शो के पांच पांच लाख रुपए लेने लगे। तकनालाजी ने भी संगीत को प्रभावित किया। साउंड रिकार्डिंग सिस्टम ने भी मौसिकी को बदला और जब दूरदर्शन आया तो visual में सब कुछ होना लगा फिर दर्शक पहले की तरह श्रोता नहीं रहे जो पब्लिक कॉन्सर्ट में सुनने जाते थे। गायकों और श्रोताओं के सम्बंध भी बदल गए। अब मौसिकी वह नहीं रही जो जोहरा बाई आगरे वाली या गंगू बाई के ज़माने में थी। वह सृजन से सांस्कृतिक उद्योग में बदल गयी।
अरविंद कुमार का आलेख
Posted Date:
February 27, 2025
11:32 am
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अशोक वाजपेयी,
रज़ा फाउंडेशन,
गंगू बाई हंगल