क्या आप ऐसे किसी अंग्रेजी जर्नलिस्ट को जानते हैं जिन्हें उर्दू से इतनी मोहब्बत हो कि उसने बकायदा उर्दू सीखकर उर्दू में अखबारनवीसी की हो और उर्दू में किताब भी लिख डाली हो? ऐसे वक़्त में जब सियासत देश में हिंदी उर्दू को आपस में लड़ा रही हो, उर्दू के खिलाफ नफ़रत फैला रही हो ,उस ज़ुबां को धर्म से जोड़ा जा रहा हो और उसे मरती हुई ज़ुबान बताया जा रहा हो, एक महिला पत्रकार ने बाकायदा उर्दू सीखकर एक किताब लिख डाली और कहा कि “उर्दू में उसका दूसरा जन्म” हुआ है। है न आश्चर्य की बात। उनकी किताब का नाम यही है। वाकई उनक़ा दूसरा जन्म उर्दू में हुआ है।
झारखंड की रोहिणी सिंह एक ऐसी अखबारनवीस हैं जिनकी उर्दू ज़ुबान नहीं थी लेकिन उन्होंने दिल्ली आने के बाद यह ज़ुबान सीखी और एक किताब भी उर्दू में लिखी। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पहली बार आयोजित पुस्तक मेले में यह किताब चर्चा का विषय बनी रही। 28 फरवरी को उसका विमोचन भी हुआ। हजारीबाग की रोहिणी वर्षों से दिल्ली में पत्रकार हैं और इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों में बकायदा काम किया और अंग्रेजी पत्रकारिता में नाम कमाया पर अपने घर में अपने दादा जी को उर्दू में पढ़ते लिखते देख उनक़ा उर्दू प्रेम जगा और इस कदर जगा की दिल्ली के उर्दू काउंसिल से उर्दू सीखी फिर उर्दू में भी अखबारनवीसी की।
रोहिणी एक सिख परिवार से आती हैं जो विभाजन के बाद भारत आकर झारखंड में बस गया। उनके दादा उर्दू जानते थे और गुरु ग्रंथ साहिब उर्दू में ही पढ़ते थे। उर्दू ज़ुबान की मिठास और खुशबू रोहिणी के दिल में बचपन में ही बस गयी। एक ऐसी ज़ुबान जो हिंदुस्तान में पैदा हुई और गंगा जमुनी संस्कृति की पहचान बन गयी। इस ज़ुबान ने दो कौमों को उनके भाईचारे और प्रेम को बांधे ही नहीं रखा बल्कि मजबूत बनाया और दोनों ज़ुबानें सगी बहनों की तरह रहीं।
उर्दू से हिंदी को औऱ हिंदी को उर्दू से अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन हाल ही में इस जुबां को लेकर जमकर सियासत हुई। सोशल मीडिया पर उर्दू को कमतर और देशद्रोही भाषा बताया गया और जब लोगों ने विरोध किया तो उनकी ट्रोलिंग भी हुई। लेकिन रोहिणी सिंह ने उर्दू में किताब लिखकर ऐसे सियासी लोगों के चेहरे पर तमाचा जड़ दिया है और समाज में कौमी मोहब्बत की मिसाल पेश की।
रोहिणी “वायर” उर्दू के लिए ही नहीं बल्कि जर्मनी के DW के लिए भी उर्दू में लिखती हैं। तथा पकिस्तान के एक अंग्रेजी प्रकाशन के लिए भी लिखती हैं। उन्हें उर्दू सीखने के बाद जो अनुभव हुए और जो अखबारनवीसी से उन्हें हासिल हुआ उसे किताब में उन्होंने कलमबद्ध किया।
रोहिणी को उर्दू की नफ़ासत, मिठास और लचक पसंद है। इस जुबान से उतनी ही मोहब्बत है जितनी हिंदी और अंग्रेजी से। उन्हें उर्दू के अफ़साने और शायरी पढ़ना पसंद। वे गंगा जमुनी तहजीब को जीती हैं महसूस करती हैं। उर्दू उनकी सांसों में ही नहीं ख्वाबों और नींद में भी है।
अरविंद कुमार की रिपोर्ट
Posted Date:March 2, 2025
7:35 pm Tags: प्रेस क्लब में पुस्तक मेला, अंग्रेजी पत्रकार का उर्दू प्रेम