कथा रंग समारोह: टैगोर की मृण्मयी की कहानी खत्म नहीं हुई है

राष्ट्रीय नाटक विद्यालय के पूर्व निदेशक के देवेंद्र राज अंकुर ने कहा है कि अभिनेताओं को रंगमंच तभी करना चाहिए जब उन्हें “आत्मिक संतोष” मिले और निर्देशकों को नाटक करते समय कलाकारों को अत्यधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए। श्री अंकुर ने कथा रंग समारोह के समापन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि वह बीस बाइस देशों की यात्रा कर चुके हैं और पाया है कि विदेशों में भी निर्देशक अभिनेताओं को कंट्रोल करते हैं,  लेकिन मैं अपने अभिनेताओं को अधिक छूट देता हूँ जिससे उनक़ा आत्मविश्वास उभरता है और अभिनय निखरता है।

गौरतलब है कि कहानी के रंगमंच के 50 वर्ष पूरे होने पर श्री अंकुर द्वारा निर्देशित 7 नाटकों के समारोह का आयोजन किया गया । गुरुवार को  गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर की कहानी “समाप्ति” के मंचन के साथ इस समारोह का समापन हुआ। टैगोर की150 वीं जयंती पर भी इसका मंचन हुआ था। अब तक देश के कई शहरों में इसके मंचन हुए हैं। टैगोर की यह कहानी एक स्त्री के जीवन की व्यथा कथा को चित्रित करती है। इसका सार यह है कि अपूर्व नामक एक मध्यवर्गीय युवक अपना विवाह एक मनपसंद लड़की से करना चाहता है जिसका नाम मृण्मयी है। पहले तो उसके परिवार वाले उसे इस लड़की से शादी करने की अनुमति नहीं देते क्योंकि यह लड़की बहुत ही चंचल उन्मुक्त उच्श्रृंखल और मनमौजी भी है। दरअसल टैगोर यह दिखाना चाहते हैं कि बंगाल का भद्र लोक समाज स्त्रियों को ” संस्कारवान” देखना चाहता आया है। वह मानता है कि स्त्री को एक समर्पित पत्नी और एक आज्ञाकारी बहू के रूप में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उसे लोक लाज का भी ख्याल रखना चाहिए ।

लेकिन मृण्मयी अपने ऊपर अंकुश लगने नहीं देती है। अंततः अपूर्व की जिद को देखते हुए परिवार वाले उसकी शादी मृण्मयी से करने को तैयार हो जाते हैं लेकिन जब वह ससुराल आती है तो उसकी चंचलता और उन्मुक्तता पहले की तरह जारी रहती है जिसे देखकर परिवार वाले उससे चिढ़ने लगते हैं, डाँटने लगते हैं और उसे असंस्कारी स्त्री कहने लगते हैं । अंत में वह नाराज होकर अपने पिता के पास चली जाती है क्योंकि अपने ससुराल में वह बहुत ही घुटन महसूस करती है और लगता है कि उसे कैद करके रखा गया है। उसके ससुराल वाले उसे बाहर जाने भी नहीं देते हैं। कमरे में बंद करके रखते हैं ताकि वह बाहर जाकर इस तरह अपना चंचल व्यवहार व्यवहार प्रदर्शित न करें और इस तरह परिवार की प्रतिष्ठा पर आंच न आए। इस तरह नाटक आगे बढ़ता है और अंत में मृण्मयी कोलकाता अपने पति के पास जाती है जो अपनी पढ़ाई पूरी करने पर भी घर नहीं लौटता। जाने से पहले पति-पत्नी में थोड़ा तनाव भी होता है और दोनों एक दूसरे से रूठ भी जाते हैं। असल में टैगोर इस कहानी को कहते हुए अंत में एक सुखद समापन करते हैं जिसमें मृण्मयी पति के प्रति समर्पित हो जाती है लेकिन यह नाटक खत्म हो जाने के बाद भी खत्म नहीं होता है।

दर्शकों के मन में एक सवाल उठता है कि क्या टैगोर के निधन के 83 साल बाद भारतीय समाज विशेष कर बंगाली समाज बदल गया है ? क्या आज स्त्री को परिवार में उस तरह की घुटन महसूस नहीं होती? क्या उस पर अब अंकुश नहीं लगता ? क्या बंगाल का भद्र लोक अब बदल गया है ? यह सही है कि बंगाल के पुनर्जागरण के बाद वहां भी आधुनिकता की बयार बही है लेकिन इसके बावजूद स्त्री की स्थिति बहुत अधिक बदली नहीं है इसलिए आज से टैगोर की कहानी बहुत कुछ कहते हुए भी बहुत कुछ नहीं कर पाती है लेकिन टैगोर ने हमेशा स्त्री की आज़ादी की बात भले ही की हो लेकिन उनकी स्त्रियों ने अंत में उस पितृसत्त्ता को स्वीकार कर लिया हो। टैगोर की एक और कहानी “एक पत्नी का पत्र “भी कुछ इसी तरह की बात कहती है।
जहां तक कहानी के मंचन की बात है अंकुर जी ने इसमें फिर अपनी निर्देशकीय प्रतिभा और सूझ बूझ का कमाल दिखाया है लेकिन विजय पंडित के “जोगिया राग” की तरह यह नाटक उतना कसा हुआ नहीं है. इसमें कुछेक स्थान पर थोड़ी सी ढलाई दिखती है। इसमें अमित सक्सेना का अपूर्व के रूप में अभिनय अच्छा है। वह एक बंगाली युवक को प्रदर्शित करते हैं। उसके किरदार के संस्कारों, हाव-भाव में अभिनय और संवाद में  फिट नजर आता  है लेकिन गौरी एक बंगाली युवती की तरह कम दिखती है। उसके अभिनय में कमी नहीं बस समस्या उसकी कद काठी और उसके व्यक्तित्व को लेकर है । वह बंगाली युवती नहीं बल्कि दिल्ली या किसी अन्य राज्य की युवती अधिक नजर आती है। इसीलिए वह अपूर्व का उस तरह “काउंटर पार्ट” नहीं हो पाती है। उसके अभिनय में उतनी कमी नहीं है जितना उसके व्यक्तित्व में है। अमिताभ श्रीवास्तव और अन्य अभिनेता बेहतर दिखाई देते हैं और यह एक बंगाली परिवार की तरह नजर आता है। लेकिन नाटक में और बंगालीपन होता तो बेहतर होता। कई दृश्य विशेष कर नाव यात्रा करने वाले दृश्य बहुत ही सुंदर बन पड़े हैं। कुल मिलाकर अच्छी प्रस्तुति है। इस नाटक के अलावा इस समारोह के दौरान मन्नू भंडारी के कथाकर्म पर आधारित नाटक मन्नू की बेटियाँ का भी असरदार प्रदर्शन किया गया।

अंकुर जी ने देखते देखते आधी शताब्दी कहांनी के रंगमंच को गुजार दी। हिंदी साहित्य को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार और रंग समीक्षक विमल कुमार की रिपोर्ट

 

Posted Date:

May 2, 2025

3:53 pm

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