क्या  आप विश्व प्रसिद्ध अभिनेत्री और नाट्य  चिंतक स्टैला एडलर को जानते हैं ?

अमेरिका के न्यूयॉर्क में जन्मी स्टैला अगर आज जीवित होती तो वह 126 वर्ष की होती। वे दुनिया की जानी-मानी रंगकर्मी और रंग  चिंतक मानी जाती हैं । उनकी एक मशहूर किताब ” द आर्ट ऑफ एक्टिंग “रंगकर्म की दुनिया में मील का पत्थर मानी जाती है और सभी रंगकर्मी अपने जीवन में एक बार जरूर इस पुस्तक को पढ़ना चाहते हैं । राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यवाहक निदेशक एवं रंग मंडल के प्रमुख रह चुके प्रसिद्ध रंगकर्मी सुरेश शर्मा ने इस किताब का एक सुंदर अनुवाद किया है जिसका लोकार्पण  “भारंगम” के श्रुति कार्यक्रम में किया गया।
इस किताब पर एक महत्वपूर्ण चर्चा भी हुई जिसमें चर्चित रंगकर्मी वाणी त्रिपाठी टिक्कू और नाट्य समीक्षक संगम पांडे ने भाग लिया. मंच का संचालन प्रकाश झा ने किया .।
इस किताब की भूमिका रामगोपाल बजाज ने लिखी है।जबकि मूल अंग्रेजी किताब की भूमिका स्टैला के शिष्य एवम दुनिया के लेजेंडरी अभिनेता मार्लिन ब्रांडों ने लिखी थी।

सुरेश शर्मा ने इस किताब का परिचय देते हुए कहा कि चूंकि नाटक की दुनिया में हिंदी प्रदेश के बहुत सारे छात्र आते हैं जो होते तो प्रतिभाशाली हैं पर हिंदी भाषी होने के कारण अंग्रेजी की किताबों को पढ़ने समझने से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने बिहार उत्तर प्रदेश के बहुत सारे छात्रों को ध्यान में रखते हुए इस किताब का अनुवाद किया कि वे दुनिया में अभिनय को लेकर सैद्धान्तकी से परिचित हो सकें। मैंने पहले भी स्टालेनेवस्की पर सोनिया मूर की किताब का अनुवाद किया था। ताकि इन्हें पढ़कर छात्र ऐसे नाट्य चिंतकों ने जो विचार व्यक्त किए हैं उससे वाकिफ हो सकें।
उन्होंने बताया कि स्टेला “मेथड एक्टिंग” के विरुद्ध थीं और यही कारण था कि वह विश्व प्रसिद्ध नाट्य सिद्धांतकार और महान रंगकमी स्टालेनेवस्की के सिद्धांतों से सहमत नहीं थी। उनका उनसे मतभेद भी हुआ था और उन्होंने रंग कर्म के क्षेत्र में अपना नया रास्ता विकसित किया और उन्होंने अभिनय के नए सिद्धांत भी प्रतिपादित किया। जन्होंने अभिनय में कल्पना पर जोर दिया ।
स्टेला का जन्म 1901 में हुआ था और स्टालेनेवस्की का जन्म 1863 में हुआ था और निधन 1938 में जबकि स्टैला 1992 में 92 वर्ष की आयु में मरी।

वरिष्ठ नाट्य समीक्षक संगम पांडे का कहना था कि यह किताब दरअसल स्टेला के क्लासरूम लेक्चर का संचयन है। हम अक्सर पश्चिमी नाट्य चिंतन की बात करते हैं और उसके आधार पर नाटकों का मूल्यांकन करते हैं जबकि भारतीय नाटक चिंतन की दिशा अलग है और यहां हम रस सिद्धांत पर अधिक जोर देते हैं।हमारे लिए नाटक में लय ताल अलंकार रस आनंद अधिक महत्वपूर्ण होता है ।हम अभिनय की नैसर्गिकता पर जो देते हैं।अभिनेता को एक नवजात शिशु की तरह नैसर्गिक होना चाहिए।।दरअसल भारतीय सौंदर्य शास्त्र यूरोप के सौंदर्य बहुत से अलग है।
वाणी त्रिपाठी ने इस अनुवाद की प्रशंसा करते हुए कहा कि अनुवाद नहीं बल्कि इसे एडॉप्शन कहा जाना चाहिए क्योंकि यह बिल्कुल सरल भाषा में किया गया अनुवाद है बल्कि सुरेश शर्मा ने उसका रूपांतरण ही कर दिया है।
सुरेश शर्मा ने भी भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का उल्लेख करते हुए अभिनेता की विशेषता बताते हुए कहा कि रंगकर्मी को ईर्ष्या द्वेष लालच अहंकार आदि से ऊपर उठकर संत ऋषि की तरह होना चाहिए।

दिल्ली से अरविंद कुमार की रिपोर्ट

Posted Date:

February 2, 2026

4:54 pm Tags: , , ,

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