कला को चारदीवारियों से बाहर निकालने की ज़रूरत – गणनायक

‘नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट ‘के महानिदेशक अद्वैत गणनायक से बातचीत

देश का सबसे बड़ा कला संग्रहालय नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) आखिर दिल्ली की इतनी अहम जगह पर बने होने के बावजूद खाली क्यों पड़ा रहता है? क्यों यहां दर्शकों की संख्या गिनी चुनी है और क्यों कलाकार या कलाप्रेमी यहां आने से परहेज़ करते हैं? इस सबसे पुरानी और बेहद खूबसूरत गैलरी को गुलज़ार बनाने और इसके प्रति कलाकारों और कलाप्रेमियों में उत्साह भरने का काम कैसे हो और इसे कलाकारों के लिए एक मीटिंग प्वाइंट के तौर पर कैसे विकसित किया जाए? ये तमाम सवाल अक्सर उठते रहे हैं लेकिन अब इन सवालों का नए सिरे से व्यावहारिक तौर पर जवाब ढूंढने का काम तेज़ कर दिया गया है।

एनजीएमए को नौकरशाही की गिरफ्त से मुक्त करने के लिए सरकार ने पहली बार एक कलाकार को यहां का महानिदेशक बनाया है। उड़ीसा के इस चर्चित कलाकार और मूर्तिकार अद्वैत गणनायक के मूर्तिशिल्प की झलक आपको कई जगह देखने को मिल जाएगी। राजघाट पर गांधी के डांडी मार्च पर उनका शिल्प सबको खींचता है, ललित कला अकादमी में माई टेम्पल और नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट में फाइव एलिमेंट्स जैसी उनकी कृतियां लोगों ने काफी पसंद की हैं। लंदन में ग्रेनाइट पत्थरों पर गढ़ा उनका शिल्प मेडिटेशन भी काफी चर्चा में रहा है। अद्वैत गणनायक ने एनजीएमए महानिदेशक की कुर्सी संभालने के बाद व्यवस्थाओं को बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। उनका मानना है कि कला को चारदीवारियों से बाहर निकाल कर आम लोगों तक ले जाना चाहिए। उनसे बातचीत के कुछ खास अंश –

सवाल – एनजीएमए में आप किस तरह का बदलाव करने को सोच रहे हैं ?

जवाब – सबसे पहले तो यहां उपलब्ध पेंटिग्स और कलाकृतियों के ख़ज़ाने को सहेजना, उचित जगह पर सुरक्षित और संरक्षित रखना और देशभर के कलाकारों को किसी न किसी रूप में गैलरी से जोड़ना चाहता हूं। यहां करीब 18 हज़ार पेंटिग्स और कलाकृतियां हैं। इसके उचित देखभाल के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं है। पिछले करीब 10-12 सालों से यहां कोई नई पेंटिग या कलाकृति नहीं खरीदी गई है और नए कलाकारों को नहीं जोड़ा गया है। मेरी कोशिश है कि इस गैलरी के दरवाज़े सबके लिए खोल दूं। नई पेंटिग्स खरीदने के लिए एक कमेटी बनाई है और जल्दी ही कलाकारों से उनके कामकाज का ब्यौरा मंगवाया जाएगा। इसके लिए विज्ञापन छपेंगे।

सवाल – क्या वजह है कि इंडिया गेट जैसे केन्द्रीय और सुलभ जगह पर होने के बावजूद यहां लोग काफी कम संख्या में आते हैं? क्या लोग इसके बारे में जानते नहीं या गैलरी लोगों को यहां लाने की कोशिश नहीं करता ?

जवाब – दरअसल बहुत सारे लोगों को इस गैलरी के बारे में पता ही नहीं है। दूसरे शाम होते ही यहां वीरानी सी छा जाती है। इंडिया गेट पर लोग पिकनिक के मूड में रात एक बजे तक भी जुटे रहते हैं लेकिन कोई इस तरफ नहीं आता। ये ठीक है कि हमें यहां महज़ भीड़ नहीं जुटानी है और कला के प्रति हरेक में दिलचस्पी शायद उतनी न होती हो, लेकिन ये ज़रूरी है कि हम कम से कम कलाकारों को और कलाप्रेमियों को यहां लाने की कोशिश ज़रुर करें। मेरे पास रोज़ ही नए नए सुझाव लेकर लोग आते हैं। जैसे यहां फूडकोर्ट बनाना चाहिए, इटिंग ज्वाइंट बने, सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, लगातार वर्कशॉप्स हों, इसे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की तरह विकसित किया जाए, यहां कलाकारों का क्लब बने वगैरह वगैरह। मैं सारे सुझाव सुनता हूं और इनमें से कुछ को गंभीरता से लेता भी हूं।

सवाल – इनमें से कौन सा सुझाव आपको व्यावहारिक और गंभीर लगता है और आप कैसे इसपर काम करेंगे ?

जवाब – फूडकोर्ट वाला सुझाव अच्छा है। हां, इसे थोड़ा कलात्मक तरीके से विकसित किया जाए तो बेहतर होगा। कुछ परफॉर्मिंग आर्टिस्ट को भी वीकेंड में लाया जाए और शाम के वक्त कुछ कलात्मक और संगीतमय प्रस्तुतियां हों तो शायद लोग यहां आना पसंद करें। दूसरे, जिस तरह त्रिवेणी आर्ट गैलरी गुलज़ार रहती है, वहां का एंबिएंस आपको अच्छा लगता है, एनजीएमए को भी अगर कुछ कुछ वैसा बना सकें तो शायद कलाकारों को अच्छा लगेगा। मैं चाहता हूं कि मंडी हाउस से अलग कलाकारों का यह एक मीटिंग प्वाइंट बने, नए नए लोग आएं, देशभर के कलाकार आएं, एक दूसरे से खुलकर बात करें। कला के तमाम आयामों पर रचनात्मक चर्चा हो।

सवाल – क्या इसके लिए आपके पास पर्याप्त बजट है ? अपनी योजना को कैसे साकार करेंगे ?

जवाब – फिलहाल तो एनजीएमए को कुल करीब 30 करोड़ का सालाना बजट मिलता है। इसमें हमें दिल्ली के साथ साथ मुंबई और बंगलुरु केंद्र का भी खर्च उठाना पड़ता है। करीब 200 स्टाफ के वेतन में ही ज्यादा खर्च हो जाता है। अब कोलकाता में भी एनजीएमए का नया केन्द्र खोलने की प्रक्रिया चल रही है। मैं सरकार से ज्यादा बजट की मांग करूंगा। मौजूदा वक्त में मुश्किल ज़रूर है लेकिन करना तो है। अभी हमारे पास स्टाफ की कमी है, लंबे समय से नियुक्तियां नहीं हुई हैं। काम तभी बेहतर होगा जब आपके पास पर्याप्त वर्कफोर्स हो।

सवाल –  ज्यादा से ज्यादा कलाकारों को जोड़ने के लिए क्या करेंगे ?

जवाब – मेरा मानना है कि कला को चारदीवारी से बाहर निकालना चाहिए। इसे गली – मोहल्लों में, गांव-चौबारों में, हर छोटे बड़े शहरों में ले जाना चाहिए। कलाकारों का मकसद महज बड़ी गैलरी में प्रदर्शनी लगाने या विदेशों में अपनी कला को बेचने भर का नहीं होना चाहिए। ठीक है, वह भी ज़रूरी है लेकिन जबतक आपकी कला आम लोगों तक न पहुंचे, उसका क्या फायदा है। आखिर कलाकार कला के ज़रिये खुद को अभिव्यक्त करता है, समाज को अपने चश्में से देखता है.. जाहिर है कि उसे अपनी यह अभिव्यक्ति आम लोगों तक पहुंचानी चाहिए, जो संदेश वह देना चाहता है, वह लोगों तक पहुंचना भी तो चाहिए। मेरी कोशिश होगी कि एनजीएमए ऐसी ही कुछ पहल करे।

सवाल – आपको नहीं लगता कि सरकारी कला संस्थानों और संग्रहालयों की हालत नौकरशाही की वजह से ज्यादा खराब हुई है ? फंड का गलत इस्तेमाल होता रहा है ?

जवाब – मैं भी सुनता तो रहा हूं ऐसा, लेकिन अभी तक मुझे काम करने में खास दिक्कत नहीं आ रही। सबका सहयोग मिल रहा है। यह आरोप तो लगते ही रहे हैं कि कला और संस्कृति के नाम पर मिलने वाले फंड का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं होता। लेकिन एनजीएमए में जो खज़ाना है, बेशक वह कहीं नहीं है। इसका विस्तार करना मेरा मकसद है। और कोशिश यही रहेगी कि फंड का सही इस्तेमाल हो और सचमुच कलाकारों और कलाप्रेमियों को उसका लाभ मिल सके।

सवाल – सरकार बदलने के साथ ही जिस तरह इन संस्थानों में भी सत्ता बदल जाती है, क्या उससे कामकाज पर फर्क नहीं पड़ता ?

जवाब – मुझे लगता है कला और कलाकार को सियासत से दूर रहना चाहिए। अफसोस है कि यहां भी खेमेबाज़ी रही है लेकिन मैं एक कलाकार हूं और मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ हर क्षेत्र के कलाकारों को साथ लेकर चलना है। जो ज़िम्मेदारी मुझे दी गई है, उसे अच्छी तरह निभा सकूं और कुछ नया कर सकूं, बस यही चाहता हूं।

Posted Date:

July 20, 2017

4:45 pm Tags: , , , ,

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