‘सरयू से गंगा’ ने दिलाई ‘वोल्गा से गंगा तक’ की याद

अपने ज़माने के मशहूर सांस्कृतिक हस्ताक्षर रहे जाने माने यायावर लेखक राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास ‘वोल्गा से गंगा तक’ जिसने भी पढ़ा होगा, उसके लिए भारतीय इतिहास में ब्राह्मणवाद के तमाम ढकोसलों को समझना आसान है। राहुल जी ने यह उपन्यास 1943 में लिखा था। साहित्य अकादमी सभागार में 28 अप्रैल को मशहूर स्तंभकार और लेखक कमलाकांत त्रिपाठी की किताब ‘सरयू से गंगा’ पर चर्चा के दौरान राहुल सांकृत्यायन तो किसी को याद नहीं आए लेकिन किताब के शीर्षक ने ‘वोल्गा से गंगा तक’ की याद ज़रूर ताज़ा कर दी।

किताबघर प्रकाशन ने यह किताब छापी है और इसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए तमाम साहित्यकारों ने उस पूरे दौर को देखने की कोशिश ज़रूर की।  

‘सरयू से गंगा’  पर हुई परिचर्चा में मुख्य अतिथि प्रो0 नित्यानंत तिवारी ने कहा कि उपन्यास इतिहास की धारा को सही तरीके से उभारता है। तत्कालीन समाज में जो डर व्याप्त है, उपन्यास का हर पात्र उसकी गिरफ्त में नज़र आता है। लेकिन उस डर और उसके पीछे की अमानवीयता से सतत् लड़ता हुआ दिखाई पड़ता है जो आज के परिदृष्य के लिए बेहद प्रासंगिक है। उपन्यास हिन्दू-ंमुस्लिम समाज का वह रूप पेश करता है जो काफी कुछ जायसी के पद्मावत में मिलता है।

कथाकार संजीव ने सरयू से गंगा को इतिहास औऱ सामाजिक जीवन के विस्तृत फलक पर लिखा गया एक वृहद् औपन्यासिक कृति बताया। पानीपत, प्लासी, बक्सर, मुगल साम्राज्य का ह्रास, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के वर्चस्व में सतत विस्तार और नेपाल के एकीकरण की प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में उन्होंने मालगुजारी, तालुकेदारी, किसानी और खेती को उपन्यास के केन्द्र में बताया। उपन्यास की देशज भाषा के सौन्दर्य को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि पूरा उपन्यास अवधी की छौंक से सुगन्धित है।

प्रसिद्व नाटककार और कथाकर असगर वजाहत ने बताया कि उपन्यास भूत, वर्तमान और भविष्य में विचरण करते हुए अवध प्रदेश की सामंती व्यवस्था के उपनिवेशवादी व्यवस्था में अंतरण की कथा कहता है। उपन्यास में तत्कालीन समाज में धर्म का वह मानवीय चेहरा दिखाया गया है जो आज के मौजूदा संदर्भों में कहीं नहीं दिखता। अमित धर्मसिहं ने उपन्यास को इतिहास, समाज और जीवन के सन्दर्भों में बांटकर देखा। वहीं पत्रकार एवं लेखक राकेश तिवारी ने उपन्यास में धार्मिक आडम्बर के रूप में महामत्युंजय जप के प्रसंग का जिक्र करते हुए, लेखक को ऐसे आडम्बरों के खिलाफ खड़ा देखा। उन्होंने सरयू से गंगा को मूलतः ग्रामीण किसान और मजदूर वर्ग का उपन्यास बताया।

कवि और आलोचक बली सिंह ने उपन्यास के विस्तृत फलक पर तत्कालीन गाँव, किसान, खेत, फसल, जंगल, नदी आदि के भौगोलिक और प्राकृतिक परिदृश्य को मूर्तिमान होते हुए देखा।

दिल्ली विष्वविद्यालय के प्राघ्यापक और लेखक कैलाश नारायण तिवारी ने लेखकीय स्वायत्तता और स्वतंत्रता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कमलाकान्त का यह उपन्यास प्रेमचंद के गोदान की याद दिलाता है। वहीं कर्ण सिंह चौहान ने कहा कि कोई भी कृति हमारे सामने संवाद के लिए होती है और यह उपन्यास हमारे सामने  सजीव संवाद प्रस्तुत करता है। ऐसे उत्तम कोटि के उपन्यास बहुत कम और बहुत समय बाद आते हैं।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने उपन्यास को इतिहास की प्रक्रिया से उपजे उस संकट के मर्म को खोलने वाला बताया जिसमें व्यापारी बनकर आये अंग्रेज राज सत्ता पर काबिज होते हैं। इतिहासकार राय चौधरी का हवाला देते हुए उन्होने कहा कि इस उपन्यास में उन्नीसवीं शताब्दी के उपन्यासों की तरह कहीं भी मुस्लिम पुरुष और महिला पात्रों को मानव चरित्र की बुराई की प्रतीक के रूप में नहीं दिखाया गया है। यह कृति धर्म का अतिक्रमण करती हुई मनुष्य के उज्जवल पक्ष को उजागर करने के कारण इस शताब्दी की महत्वपूर्ण औपन्यासिक कृति के रूप में जानी जायेगी।

परिचर्चा के अंत में अनुपम भट्ट ने जाने माने दक्षिण भारतीय लेखक और कर्नाटक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 टी.आर. भटट् का संदेश पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने कमलाकान्त त्रिपाठी को बधाई देते हुए उन्हें दक्षिण भारत के एस.एल. भैरप्पा के समकक्ष बताया।

Posted Date:

May 1, 2019 4:35 pm

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