बंटवारे के दर्द और सियासत से आहत रहीं कृष्णा सोबती

  • अतुल सिन्हा

94 साल की उम्र में कृष्णा सोबती का चले जाना एक युग के खत्म होने जैसा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि कृष्णा सोबती ने कुछ कविताएं भी लिखी हैं। कुछ ऐसी कविताएं जिनसे उनके सत्ता और सरकारों के प्रति नाराज़गी भी झलकती है और उनके भीतर छिपी बेचैनी भी दिखती है। उनके उपन्यास, उनकी कहानियां और संस्मरण खूब चर्चा में रहे हैं। एक लंबी फेहरिस्त है उनकी किताबों की – मित्रो मरजानी, डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, ऐ लड़की, यारों के यार तिनपहाड़, दिलो दानिश, ज़िंदारुख और भी ढेर सारी। उनकी रचनाओं में बंटवारे का जो दर्द आपको महसूस होता है और जीवन की जो सच्चाइयां मिलती हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके भीतर अपने सत्ता प्रतिष्ठानों और सियासत के घिनौने खेल को लेकर नाराज़गी झलकती है।

आपको याद होगा 2010 में कृष्णा सोबती को सरकार ने पद्म विभूषण सम्मान देने का ऐलान किया, लेकिन कृष्णा जी ने बड़े अदब के साथ वह सम्मान लेने से मना कर दिया। एक इंटरव्यू में जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा – ‘मैं बहुत साधारण और छोटी लेखिका हूं। और मेरा मानना है कि जो बुद्धिजीवी हैं, जो सोचने की ताकत रखते हैं, अगर वो अपने मुल्क की जनता और यहां की हकीकत को देख सकते हैं, उसे ठीक से पढ़ सकते हैं, उसे बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं करते… तो उनका ये फर्ज है कि वो इस्टैबलिशमेंट से दूर रहें…’

लेकिन टुकड़े टुकड़े में उन्हें जितना भी जानने समझने का मौका मिला, जितना उन्हें पढ़ सका, उससे साफ है कि उनके भीतर हमेशा से एक कचोट सी रही। खासकर अपने उस पाकिस्तान वाले गुजरात के बिछड़ जाने का दर्द रहा जहां वो पैदा हुईं और जो आज के हिन्दुस्तानी गुजरात से कहीं अलग था। और इसी दर्द को लेकर उन्होंने अपने अंतिम दिनों में भी एक उपन्यास लिखा – गुजरात पाकितान से गुजरात हिन्दुस्तान तक… । इस उपन्यास के बारे में उन्होंने कुछ इस तरह लिखा –  बँटवारे के बाद बना पाकिस्तान उस त्रासदी से पहले जिनके लिए अपना प्यारा हिंदुस्तान था। वे लोग, अपने ही आजाद मुल्क में जिनके कदम विस्थापित शरणार्थियों के भेस में पड़े, यह उपन्यास उन उखड़े और दर-ब-दर लोगों की रूहों का अक्स है। 

उनके भीतर अपने स्कूल के वो दिन रचते बसते थे जब हरिवंश राय बच्चन की मां उन्हें पढ़ाती थीं। वो हमेशा खुद को बहुत साधारण और छोटी रचनाकार मानती रहीं और देश के विभाजन के बारे बारे में वो बार बार कहती रहीं कि ये सब पॉलिटिक्स है। वो कहती हैं.. ‘हमने वो सारे दर्द देखे है… जहां आप अपने दोस्तों को याद करते हैं… जिन्हें भूलना मुश्किल है और याद करना और मुश्किल हैं…’।

सियासतदानों और सत्तानशीनों से उनकी हमेशा से सख्त नाराज़गी रही। अपने देश के हालात उन्हें हमेशा परेशान करते। हिन्दू-मुसलिम के बीच दरार पैदा करने की कोशिशें, देश को बांटने की सियासी साजिश और वोटबैंक की राजनीति में इंसानों को बांटने की हरकतें… ये सब कृष्णा सोबती को दिल से तकलीफ देती रहीं। वो अक्सर कहती थीं – ‘क्या वजह है कि एक संविधान के होते हुए भी, हमने इसे अपनाया नहीं, इससे सीखा नहीं… यह हमारे लिए बहुत खतरनाक चीज है… इतनी मशक्कत के बाद तो आपने एक संविधान बनाया है तो कम से कम इसे मानिए तो सही…’।

हिन्दी और उर्दू के साथ ही तमाम भाषाओं और संस्कृतियों की खूबियों का ज़िक्र वो हमेशा करती थीं। जब भी आप उनसे इस बारे में चर्चा करें तो वो हिन्दुस्तान की तमाम संस्कृतियों और भाषाओं की बहुलता और विविधता के बारे में डूब कर बताती थीं। लेकिन उन्हें इस बात की तकलीफ रही कि अपने देश में सियासत अपनी इसी खूबी को दांव पर लगाकर खेली जाती है जो बेहद खतरनाक है। वो कहती थीं – ‘हर चीज को पोलिटिकली देखना और इंसानी चीज़ को अलग करके उसके लिए दबाव डालना वो मुनासिब नहीं है… हर भाषा की अपनी एक संस्कृति है… हिन्दुस्तान ही ऐसा है जहां इतना कल्चर है.. बंगाल अलग है, तमिल अलग है, तेलुगु अलग है… और हिन्दुस्तानी होने के नाते हमारे अंदर ये जिज्ञासा होनी चाहिए कि आखिर वह भाषा और संस्कृति कैसी है..’।

बेशक कृष्णा सोबती का गुज़र जाना साहित्य के लिए और अपने देश के लिए एक पूरे दौर और इतिहास के गुजर जाने जैसा है। उनकी इस कविता को पढ़ते पढ़ते उन्हें सादर नमन।

तर्ज़ बदलिए…

गुमशुदा घोड़े पर सवार

हमारी सरकारें

नागरिकों की तानाशाही से

लामबंदी क्यूं करती हैं

और दौलतमंदों की

सलामबंदी क्यूं करती हैं

सरकारें क्यूं भूल जाती हैं

कि हमारा राष्ट्र एक लोकतंत्र है

और यहां का नागरिक

गुलाम दास नहीं

वो लोकतांत्रिक राष्ट्र

भारत महादेश का

स्वाभिमानी नागरिक है

सियासत की यह

तर्ज़ बदलिए…

Posted Date:

January 25, 2019 5:21 pm

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