‘कला-संस्कृति किसी राजनीतिक पार्टी का हिस्सा नहीं हो सकती’

नुक्कड़ नाटकों को आंदोलन बना देने वाले अरविंद गौड़ मानते हैं – रंगमंच सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होना चाहिए

जब देश में रंगमंच आंदोलन कहीं हाशिए पर खिसक गया हो और जब रंगकर्मियों के सामने सिनेमा, टीवी और डिजिटल मीडिया की बड़ी चुनौतियां हों, ऐसे में अगर कोई रंगकर्मी लगातार तीन दशकों से नुक्कड़ नाटकों के लिए ही समर्पित हो तो भरोसा जगता है कि रंगमंच कभी खत्म नहीं हो सकता। रंगकर्मी अरविंद गौड़ अपने आप में एक संस्था बन चुके हैं। अस्मिता थियेटर ग्रुप उन्होंने करीब 27 साल पहले शुरू किया था। अरविंद ने अस्सी के दशक में नाटकों पर समीक्षाएं लिखनी शुरू कीं। तमाम जनांदोलनों से जुड़े रहे और हर ज़रूरी सवाल को अपने रंगकर्म के ज़रिये कलमबद्ध करते और जोशीले नौजवानों की टोली बनाकर नुक्कड़ों और चौराहों पर निकल पड़ते। तब नुक्कड़ नाटकों को आम तौर पर वामपंथी आंदोलन का हिस्सा माना जाता था और इसे नारेबाजी और सत्ता विरोध से जोड़कर देखा जाता था। दरअसल इप्टा, जन नाट्य मंच और जन संस्कृति मंच जैसी वामपंथी पार्टियों से जुड़ी संस्थाओं ने जिस रंग आंदोलन का प्रचार प्रसार किया, उससे नुक्कड़ नाटक करने वाला हर रंगकर्मी सत्ता की नज़र में वामपंथी और सरकार विरोधी करार दिया जाता था। अरविंद ने भी ऐसे कई गंभीर दौर देखे और पुलिस और प्रशासन की नज़र में खटकने लगे। लेकिन उनके कदम रुके नहीं और उन्होंने ये स्थापित कर दिया कि नुक्कड़ नाटक सिर्फ सत्ता विरोध के लिए नहीं किए जाते। उन्होंने बताया कि हम रोज़ाना कई ज़रूरी सवालों से जूझते हैं और हमारी जटिल सामाजिक व्यवस्था हमें अपने हकों से दूर करती है।

अस्मिता थिएटर की शुरुआत में उन्होंने ये तय किया कि उनके नाटकों का मकसद पैसे कमाना या सत्ता प्रतिष्ठानों की मदद से कलाकार पैदा करना नहीं है। उन्होंने नाटकों की बंधी बंधाई परिभाषाएं बदलीं और हर नाटक को मौजूदा संदर्भ और समाज के ज़रूरी सवालों के इर्द गिर्द बुनना शुरू किया। चाहे छात्रों के सवाल हों, महिलाओं की समस्याएं हों, भ्रष्टाचार और पुलिस-गुंडा गठजोड़ हो या फिर महंगाई से जुड़े मुद्दे। अरविंद अपने रंगकर्मियों को पहले सामाजिक-राजनीतिक तौर पर जागरूक करते हैं, पढ़ने और सवालों के तह में झांकने के लिए प्रेरित करते हैं और नई पीढ़ी को चेतना से लैस करते हैं।

हाल ही में वाणी प्रकाशन ने उनके नुक्कड़ नाटकों का एक संग्रह छापा है – नुक्कड़ पर दस्तक। अरविंद गौड़ से बातचीत करते वक्त वो उन संदर्भों को कभी नहीं भूलते जिनकी बदौलत आज वो इस मुकाम पर हैं। अरविंद के पिता जी एक स्कूल टीचर थे और बेहद सामान्य मध्यवर्गीय परिवार का होने की वजह से अरविंद ने लंबी चौड़ी पढ़ाई नहीं की। नाटकों के प्रति उनका रुझान स्कूल के दिनों से था। उन्हें पता था कि पूरी तरह नाटकों के भरोसे ज़िंदगी काटना आसान नहीं है। घर का समर्थन उन्हें मिला लेकिन सब जानते थे कि नाटकों से जीवन नहीं चलता। फिर भी माता-पिता ने कभी अरविंद को आगे बढ़ने से रोका नहीं, संघर्ष में साथ दिया। नाटकों का जुनून ऐसा कि अरविंद ने इसे ही उन्होंने अपना जीवन बना लिया। जीवन संगिनी संगीता गौड़ नें संगीत की अपनी प्रतिभा की बदौलत अरविंद के साथ उनके हर नाटक और मिशन में जुड़ी रही हैं। उनकी दोनों बेटियां काकोली और सावेरी भी बचपन से उनके मिशन में हमेशा साथ निभा रही हैं और अब अपनी पहचान भी बना चुकी हैं।

अरविंद बताते हैं ‘शुरूआती दौर में मुझे भी लगता था कि नुक्कड़ों पर नाटक करना, नारेबाज़ी करना और चौराहों पर क्रांति का बिगुल बजाने से राजनीतिक व्यवस्था बदल जाएगी, देश बदल जाएगा, लेकिन जल्दी ही एहसास हो गया कि जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे, समाज में बदलाव नहीं हो सकता। यहीं से मेरे नाटकों में रोज़मर्रा के सवाल आने लगे, उनके अंतर्विरोध सामने आने लगे और हम इनसे उबरने के रास्ते तलाशने लगे। जाहिर है ऐसे नाटक लोगों को पसंद आते जो उन्हें अपने समाज और आसपास की दुनिया के करीब लगते। इसलिए अस्मिता के नाटकों में हमने भ्रष्टाचार, भ्रूण हत्या, एसिड अटैक, छेड़खानी, बाल मजदूरी, सड़कों पर मारपीट, गुंडागर्दी, बुढ़ापे की यातना और असंवेदनशीलता जैसे तमाम सवाल उठाए।‘

आज अस्मिता थिएटर ग्रुप से निकले हुए तमाम कलाकार फिल्मों में काम करते हैं और अपना मुकाम बना चुके हैं – चाहे कंगना रनौत हों, दीपक डोबरियाल हो, पीयूष मिश्रा हों,लुशिन दुबे हों, मानु रिशि हों, शिल्पा शुक्ला हों। फेहरिस्त लंबी चौड़ी है। कुछ ने अपनी टोली बना ली, कुछ मुंबई चले गए। तमाम टीवी सीरियल्स में काम कर रहे हैं तो कुछ लगातार नाटक कर रहे हैं।

अरविंद कहते हैं ‘ अस्मिता के कलाकारों की पहचान उनके काले कुर्ते हैं, उनकी ढपली है और लोगों को जोड़ने और आम दर्शकों को भी नाटकों का हिस्सा बना लेने की कला है। अस्मिता की मुंबई इकाई लगातार नुक्कड़ नाटक कर रही है। वहां यह संस्कृति नहीं थी, लेकिन हमने धारावी से लेकर मुंबई के तमाम झोपड़ पट्टियों, कॉलेजों, जुहु बीच पर और दूसरी कॉलोनियों में नाटकों का सिलसिला शुरू कर दिया है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान से लेकर तमाम बड़े-छोटे स्कूलों में हमारी टीम जाती है, वर्कशॉप करती है और हमारा हौसला इस बात से लगातार बढ़ता है कि हर रोज़ देश में कोई न कोई नया कलाकार पैदा हो रहा है ‘

अरविंद का मानना है कि ‘ नाटक या कला-संस्कृति किसी भी राजनीतिक पार्टी या विचारधारा का हिस्सा नहीं हो सकती। हमारे देश में कला के इतने रूप हैं, इतने आयाम हैं और हर आदमी के भीतर कहीं न कहीं एक कलाकार है। आज जरूरत है उसी कलाकार को सामने लाने की। इसीसे हमारी संवेदना बरकरार रहती है और हम तमाम मुश्किलों से उबर पाते हैं। तो बेहतर हो, अपने भीतर के कलाकार को जगाइए, खुद राजनीतिक-सामाजिक तौर पर ईमानदारी के साथ जागरूक होइए, देखिए समाज कैसे बदलता है।‘

Posted Date:

March 10, 2019 11:42 am

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