जाऊंगा कहां… देखना, रहेगा सब जस का तस…

केदार जी का जाना एक सदमे की तरह है। उनसे न मिल पाने की कसक हमेशा रहेगी। कई बार मिलते मिलते रह गया। उनके साथ ठीक वैसे ही खुलकर और पारिवारिक तरीके से हर मसले पर बात करने की तमन्ना रह गई जैसे त्रिलोचन जी के साथ किया करता था। अपने बेहद अज़ीज बड़े भाई राजीव जी के साथ अक्सर यह तय हुआ कि एक दिन उनके घर पर ही केदार जी के साथ कुछ घंटे बिताए जाएं, लेकिन वह संयोग नहीं बन पाया। केदार जी सरीखे कई अपने एक एक करके विदा होते जा रहे हैं… और यहीं आकर हम बेबस हो जाते हैं।केदार जी की कविताओं पर, उनके बारे में, उनके तमाम पहलुओं पर, उनके व्यक्तित्व पर बहुत कुछ कहा-लिखा जा रहा है। उनमें से ही कुछ हम 7 रंग के पाठकों के लिए साभार साझा कर रहे हैं।      

Posted Date:

March 20, 2018

2:26 pm
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