‘हमको यूं ही प्यासा छोड़…’

नहीं रहे बेकल ‘उत्साही’… 

ऐसे वक्त में जब देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक बहस का मुद्दा हो, बेकल उत्साही जैसी शख्सियत का हमारे बीच से चले जाना एक गहरे सदमे की तरह है। एक ऐसा ज़िंदादिल शायर जिसने अपने लफ़्ज़ों और अल्फ़ाजों से एक तरक्कीपसंद माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई और एक ऐसा शख्स जिसके लिए सियासत और साहित्य के अपने मायने थे। बेकल साहब को हमारी तहेदिल से श्रद्धांजलि…

Posted Date:

December 3, 2016

3:21 pm
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