सबके अपने, सबके प्यारे थे चितरंजन भाई …

वो जहां जाते थे, जिससे मिलते थे, सबके बहुत अपने हो जाते थे… उनकी सादगी और संघर्ष की कहानियां तमाम हैं… हर साथी की अपनी अपनी यादें हैं, अपने अपने अनुभव हैं… सबके लिए वो चितरंजन भाई थे.. हमारे लिए भी… गमछा गले में लपेटे या कभी कभार पगड़ी की तरह बांध लेते, पान खाते, गोल मुंहवाले बहुत ही प्यारे से लेकिन सबके संघर्ष के साथी… खुद की तकलीफों की कभी परवाह नहीं की… बातें करने से ज्यादा सुनने में भरोसा करते थे चितरंजन भाई। जुझारु इतने कि कभी भी, किसी भी वक्त आप उनको कहीं भी पा सकते थे। 

Posted Date:

June 27, 2020

12:11 pm
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