रज़ा और उनके सहयात्री कलाकार

 रवीन्द्र त्रिपाठी की कलम से…  किसी  बड़े कलाकार के अवदान के मूल्यांकन के लिए उसके संपूर्ण कलाकर्म को ध्यान में रखना जरूरी होता है। लेकिन सिर्फ इतने से ही बात नही बनती। ये भी देखना चाहिए कि उसका अपने सहकर्मी कलाकारों से कैसा संबंध रहा। कला एकांत साधना है पर साथ ही सामूहिक कर्म भी है। जब कोई कलाकार- लेखक और संगीतकार भी- किसी दौर में सक्रिय होता हैं तो उसी दौर में उसके कुछ सहयोगी भी सक्रिय रहते हैं जिनसे उसका संवाद भी होता रहता है। इस लिहाज से श्रीधरणी कला दीर्घा में इन दिनों चल रही प्रदर्शनी `संग- साथ’ को देखना एक अलग  तरह का कला-अनुभव है।

Posted Date:

July 14, 2019

11:19 pm
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