गिरीश कर्नाड की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी

‘…कर्नाटक कॉलेज में एक चलन था। सब कविताएं, छोटी कहानियां, लोक-कथाएं लिखते थे। मैं भी धीरे-धीरे इस ओर बढ़ने लगा और तब मुझे सबसे ज्यादा जिसने प्रभावित किया, वह थे कीर्तिनाथ कुर्तकोटि। मुझे मनोहर ग्रंथमाला में एंट्री मिली और इसी ने ही मुझे एक लेखक बनाया। मैंने सोलह साल की उम्र में अपने परिवार की एक बात जानी थी कि मेरी मां का बाल विवाह हुआ था।  वह बहुत ही कम उम्र में विधवा हो गई थीं। उस शादी से उनका एक बेटा था, जो मेरे बड़े भाई हैं। उसके बाद उन्होंने पढ़ाई की, नर्स बनीं। उसी दौरान उनकी मुलाकात पिताजी से हुई, फिर उन दोनों ने शादी कर ली। जिसके बाद मैं और मेरी एक छोटी बहन हुई। हम तीनों भाई-बहन एक साथ मिलकर रहे।…’

Posted Date:

June 10, 2019

12:40 pm
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