क्या जेपी एक ‘वैचारिक चुनावी ब्रांड’ भर हैं…

क्या देश जेपी यानी लोकनायक जयप्रकाश नारायण को भूल गया है? क्या जेपी के संपूर्ण क्रांति का सपना महज एक सपना भर बन कर रह गया है? जिस आंदोलन की उपज हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार, लालू यादव सरीखे नेतागण माने जाते हैं, क्या उसके मुखिया को याद करना एक औपचारिकता भर है?… 7 रंग ने ये तलाशने की कोशिश की कि आखिर आज जेपी को कौन, कितना और कैसे याद करता है, सियासत के मौजूदा स्वरूप में जेपी आज कितने प्रासंगिक हैं, जेपी के नाम पर राजनीति करने वाले, सत्ता पर काबिज होकर उसका दोहन करने वाले और जेपी को भी गांधी और लोहिया की तरह महज एक ‘वैचारिक चुनावी ब्रांड’ बना देने वाले उनको कितना मानते, जानते और समझते हैं….

Posted Date:

October 11, 2017

10:44 am
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