कोई तो करे फ़िक्र हम खानाख़राबियों की…

आलोक यात्री का कॉलम ‘देख तमाशा दुनिया का’

दो हफ्ते हो गै, दस दिनां से निगाहं अटकी है रस्ते पे…, मुआ कोई तो सूरत दिखाए…टंगे खिड़की पे चिड़ियाघर में बंदर की माफिक…यूई जरिया बचा अब तो…खुदी बांच लो… जो बांच लो सो बांट लो…पोथे बांचते आंख भी ढेल्ला हो गीं…क़ासिद पौहंचा ना अबी तक…कहं थे ख़त का ज़वाब ले के भेज्जा… कोरोना…कोरोना….कोरोना….. से आगे बात ही नी बढ़ री… यह क्या रीत हुई, आसन्न-पाट्टी सी लिए पड़े रहो… जैसे और पडे़…फेसबुक, वाट्सएप, मैसेंजर, इनबॉक्स, इंस्टाग्राम, अखबार से लेकर खबरिया चैनल्स तक… एक ही नसीहत देन लाग रे… बोले तो… सब कुछ कोरोनालाइज्ड हो रा…

Posted Date:

April 9, 2020

11:05 am
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