सियासत के फेर में उर्दू बेदार

इलाहाबाद :
जिस मुल्क में हम रहते है उसमें 5 करोड़ 15 लाख 36 हजार 111 लोग उर्दू के जानकार हैं जो रोजाना जिन्दगी में उर्दू बोलते या लिखते हैं| इस मुल्क के 6 सूबों में उर्दू को सरकारी जुबान का दर्जा भी दे दिया गया है। बावजूद इसके आज मुल्क में इस भाषा का सूरत-ए-हाल उर्दू पसंद लोगों की आँखें खोलने वाला है| इस बात की गुफ्तगू करने के लिए इलाहबाद में जब मुल्क भर के सभी सूबों से आये उर्दू के नुमाइंदो ने अपने अपने सूबों में उर्दू के सूरत-ए-हाल की तस्वीर सामने रखी तो हुकूमतों की तरफ से इसकी असलियत सामने आ गई| आप हैरान रह जायेंगे यह जानकर कि मुल्क में महाराष्ट्र में उर्दू के हालात सबसे बेहतर हैं जबकि वहां मुल्क के दूसरे सूबों से बहुत कम आबादी मुस्लिमों की है| महाराष्ट्र से आये उर्दू के नुमाइंदे डॉ याहया नशीत के मुताबिक़ महाराष्ट्र में 3 हजार तक की आबादी वाले हर गाँव गाँव या कस्बे में उर्दू के लिए प्राइमरी से लेकर कॉलेज स्तर तक के स्कूल हैं, वहांं सभी सब्जेक्ट की किताबें उर्दू में सरकार मुहैया कराती है, साथ ही निजी इदायरो में भी उर्दू के हालात मुल्क में सबसे बेहतर हैं|
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इलाहाबाद के हमीदिया गर्ल्स डिग्री कॉलेज में एक नेशनल सेमीनार में हिस्सा लेने आये उर्दू के इन जानकारों की ये रिपोर्ट हकीकत का एक पन्ना उस समय खोल गई जब पंजाब से गुरु गोविन्द सिंह यूनिवर्सिटी से आये डॉ रेहान हसन ने अपने सूबे में उर्दू की फजीहत की तस्वीर सामने रखी|
महाराष्ट्र के बाद दूसरे पायदान पर पंजाब है जहां आज भी सिख बिरादरी में सबसे अधिक पढ़े जाने वाले अखबारों में उर्दू के अखबारों का बोलबाला है|
अब ज़रा उन सूबों में भी उर्दू का सूरत ए हाल जान लीजिये जहां मुस्लिम आबादी के नाम सबसे अधिक सियासी बयानबाजियां होती हैं। यहाँ तक कि हुकूमतें तक इससे बनती बिगडती हैं| कश्मीर में उर्दू के हालात बेहतर नहीं है| कश्मीर में उर्दू रीजनलिस्म और मोर्डेनिज्म दोनों का शिकार है| हिन्दू मेजोरिटी वाले जम्मू इलाके में हुकुमतों ने इसे मजहब के आईने से देखने की जिद आज भी नहीं छोड़ी है जिससे उर्दू यहां सूबे की सरकारी जुबान होते हुए भी अपनी बेहतरी की जगह नहीं हासिल कर पा रही है। वहीं मुस्लिम मेजोरिटी वाले कश्मीर के इलाकों में अंगरेजी तालीम के क्रेज ने उर्दू को पीछे धकेल दिया है| कश्मीर से आये डॉ मंजूर डोइक इस बात का खुलासा कर वहां की मुस्लिम हुकुमतों के उर्दू के साथ किये जा रहे इस बर्ताव को इन्ही लफ़्ज़ों में सामने रख गए|
कमोबेश उर्दू का यही हाल यूपी में भी है जहां मुस्लिम आबादी का जिक्र भले ही अक्सर सियासी पार्टियोंं में इलेक्शन के आगे पीछे जुबां पर रहता है लेकिन उर्दू की फरोख्त और तरबीज में यहाँ केवल गिनी चुनी उर्दू अकादमी और संस्थानों को बड़ी बड़ी रकम दे दी जाती है जो शाही आलीशान मुशायरों की महफ़िलों के लुत्फ़ में खर्च हो जाती है और जिसे उर्दू के छोटे छोटे तालीमी इदायरों, उनमे पढने वाली नई नस्ल के लिए खर्च होना चाहिए| नतीजा उर्दू को सीढ़ी बनाकर पहले से बहुत आगे कुछ लोगों की तरक्की तो हो जाती है लेकिन उर्दू बस सीढ़़ियों की तरफ एक टक नजरे गड़़ाए मायूसी से उस मंज़र को देखती रहती है | लखनऊ से आये यूपी में उर्दू की नीतियों के जानकार और मुख्यमंत्री के मीडिया प्रभारी डॉ वज़ाहत रिज़वी का तो कम से कम यही हाले बयाँ है उर्दू को लेकर|
वैसे मुल्क में इन सभी राज्योंं में उर्दू की तरक्की और तरबीज के लिए जो दावे किये जा रहे हैं और जो कोशिशें कागजों में दिखती हैं उनमे मोटे तौर पर यही बात सामने आती है कि न तो उर्दू को लेकर हुकूमत संजीदा है और न खुद उर्दू की वकालत अलग अलग स्टेज पर करने वाले लोग| उर्दू की अहमियत की पूरी इमानदारी के साथ समझने के साथ उर्दू को जब तक वोकेशनल कोर्सेज से नहीं जोड़ा जाएगा हालात बेहतर नहीं होने वाले। यही बात आखिर में सेमीनार की संयोजक डॉ रेहाना तारिक ने कही। उनके मुताबिक उर्दू को वोकेशनल कोर्सेज से ईमानदारी से जोड़कर और उर्दू जानने वाले खुद अपने बच्चों को उर्दू से जोड़कर रखें तो फिर देखिए उर्दू सबकी कितनी मददगार साबित होगी।

(दिनेश सिंह की रिपोर्ट)

Posted Date:

February 19, 2016

5:13 pm

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