वजू करूं अजमेर में.. काशी में स्नान

आज के दौर में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर बहस छिड़ी है और देश एक अजीबो गरीब दौर से गुज़र रहा है। रिश्तों और सामाजिक तानेबाने पर सवाल उठ रहे हैं। सियासत के साथ साथ तकनीकी विकास, वर्चुअल दुनिया, कैशलेस इंडिया का सपना और कतारों में खड़ा देश हर गली चौराहों पर नज़र आ रहा है, ऐसे में बेकल उत्साही जैसे शायर का गुज़र जाना किसी अपने को खो देने जैसा है। उम्र बेशक 88 बरस की रही हो लेकिन उत्साही साहब का उत्साह आज भी किसी युवा से कम नहीं था। उनपर आज तमाम अख़बारों ने अपने अपने तरीके से खबरें छापीं, पेज छापे और उनकी चुनींदा रचनाएं छापीं। दैनिक हिन्दुस्तान में वसीम बरेलवी साहब ने अपने इस दोस्त के गुज़र जाने पर क्या कुछ कहा इसे बेहद संज़ीदा तरीके से छापा है। हम चाहते हैं आप भी पढ़ें…

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• वसीम बरेलवी 

आज सुबह घर से लखनऊ महोत्सव में शामिल होने के लिए निकला ही था कि बेकल उत्साही के दुनिया में न रहने की मनहूस खबर मिली। कुछ देर को सन्न रह गया। अपने ही कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था। दिल ने कहा, नहीं …यह नहीं हो सकता। बेकल जैसे भाई मेरा और हिन्दी-उर्दू के अदब का साथ छोड़ कर इतनी जल्दी कैसे जा सकते हैं। जिस दौर में उर्दू के मंच पर हिन्दी पसंद नहीं की जाती थी, पुराने लोग नाक-भौंह सिकोड़ते थे, ऐसे वक्त में बेकल ने उर्दू के मंच पर हिन्दी की धाक जमाई थी। उनका न रहना साहित्य और साहित्यकारों को बेहद खलेगा। खासतौर पर मेरे जैसे लोगों को, जिनका उनसे बड़े भाई जैसा नाता था, अब मंच पर कान बेकल साहब की आवाज को तरसेंगे और निगाहें रह-रह कर उन्हें खोजती रहेंगी। यह जानते हुए भी कि मेरा इंतजार अंतहीन होगा।

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मैं उस दौर की बात कर रहा हूं जब उर्दू के मंच पर हिन्दी को सही स्थान नहीं मिलता था, उस दौर में बेकल ने हिन्दी गीतों और शायरी के जरिए उर्दू के मंच पर धाक जमाई थी। शुरुआत में लोग उनकी शायरी और गीतों से नाक-भौंह सिकोड़ते थे, मगर आहिस्ता-आहिस्ता मंच पर उनकी जगह पुख्ता होती चली गई। यह उनकी शायरी की ही धार थी कि आलोचक ही उनके सबसे बड़े प्रशंसक बन गए। उनके गीतों-शायरी में शहरी जनजीवन के साथ-साथ गांवों का जीवन भी झलकता था। उन्होंने अपने गीतों-शायरी में हिन्दी के साथ-साथ अवधी और तमाम क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल करके गांव-गांव तक अपनी शायरी पहुंचाई। गंगा-जमुनी तहजीब के वे सबसे बड़े वाहक थे।

जब से बेकल साहब के निधन का दुखद समाचार मिला है, तब से मैं काफी दुखी हूं। उनके साथ इतनी यादें जुड़ी हैं कि विस्तार से कहें तो एक किताब लिख जाएगी। ऐसा शख्स हमारे बीच से चला गया, जिसने हमेशा मोहब्बत की सीख दी, इंसान को इंसान से जोड़ने की बात की और कलम की बुनियादी जिम्मेदारी निभाई। उनके निधन से शायरी और इंसानियत का बड़ा नुकसान हुआ है, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती। ऐसे समय में मैं उनको खिराजे अकीदत पेश करता हूं।

जब मैंने उर्दू शायरी में आंख खोली तब बेकल साहब स्टेज के स्थापित शायर बन चुके थे। उनका जलवा देखा है, उनके साथ खड़े होने में फख्र महसूस होता था। जब उर्दू स्टेज पर हिन्दी को स्थान नहीं मिलता था, ऐसे दौर में बेकल साहब उर्दू स्टेज से हिन्दी गीत और शायरी पढ़ते थे। बेकल साहब की आवाज इतनी खूबसूरत थी कि जब गीत पढ़ते तो पुराने लोग भी उनमें खो जाते। नापसंद करने वालों पर बेकल साहब ने गहरा असर डाला और उर्दू शायरी से ही दिलचस्पी रखने वालों को हिन्दी पसंद आई। धीरे-धीरे हिन्दी गीत और शायरी भी उर्दू मंच का हिस्सा बन गई। उनके गीतों में हिन्दी ही नहीं, अवधी की भोली-भाली खूबसूरतियां भी थीं। क्षेत्रीय भाषाओं के शामिल करने से हर अंचल का व्यक्ति उनसे जुड़ा था। उनके गीत हिन्दी-उर्दू भाषा के मिले-जुले गीत थे। वह जब मंच पर बोलते थे तो सबको अपने जैसे लगते थे। न कोई दिखावा न कोई छलावा। जो कुछ देखा उसे शब्दों में ढाला और सबके सामने रख दिया। बगैर यह सोचे कि आलोचक और प्रशंसक क्या सोचेंगे। बस इसी अंदाज ने उन्हें सबसे खास और सबसे अलग बना दिया।

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जहां उर्दू एक ओर शहरियत के दायरे में सिमटी हुई थी तो बेकल साहब ने शहर के साथ-साथ गांव के माहौल, वहां के दुख-दर्द को ग्रामीण अंचल की भाषा के साथ शायरी और गीतों में जोड़ा। उन्होंने गीतों में नई-नई उपमाएं, ऐसे शब्द इस्तेमाल किए, जो उर्दू मंच से कभी पढ़े ही नहीं जा सकते थे। वे सीमांत लोगों का जीवन बखूबी समझते थे। उनका जीवन उनके गीतों, शायरी में झलकता था। मंच पर उनकी कविता ऐसे लोगों के जीवन के ताने-बाने को बयां करती तो सामने बैठे तमाम लोगों की आंखें नम हो जातीं। मैंने बेकल साहब की कविताओं में डूबने के बाद तमाम लोगों को अपने आंसू पोंछते देखा है। आम आदमी की जिंदगी को जितनी खूबसूरती से उन्होंने गीतों-शेरों में बयां किया है, शायद कोई दूसरा नहीं कर पाएगा।

बेकल साहब ने हमेशा डायस पर साहित्य की जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं। डायस से कभी उन्होंने कोई ऐसा जुमला नहीं बोला जो अमर्यादित होता, किसी को अखरता या किसी का दिल दुखाता। हां, सच को बयां करना वह कभी नहीं भूले। सच कभी बेहद मीठा होता है तो कभी नीम की तरह कड़वा। हजारों-लाखों की तादात में लोग उन्हें सांस रोककर सुना करते थे। उनकी हर पंक्ति पर कभी आह निकलती तो कभी वाह। अपनी जिंदगी को उन्होंने बेहद सादे अंदाज में जिया। किसी भी बात पर कभी खुद को नुमाया करने की कोशिश नहीं की, न ही किसी दूसरे को खुद के साथ ऐसा करने दिया। जिंदगी जीने की उनकी ईमानदारी का ही नतीजा था कि मालिक ने उनको हर सम्मान से नवाजा। पद्मश्री बेकल राज्यसभा के मेंबर रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने हिंदी को आगे बढ़ाने की पुरजोर पैरवी की। साहित्यिक मंचों के साथ संसद में भी हिंदी को नए मुकाम तक ले जाने के लिए लड़े। उन्होंने दुनियाबी राजनीति को भी अपने गीतों-शायरी के माध्यम से आईना दिखाया और हुक्मरानों को रास्ता दिखाया।

राजनीति की अच्छी-बुरी चीजों को खुलकर बयां करने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया। उनके काम को न कभी उर्दू स्टेज और न कभी हिन्दी नजरअंदाज कर पाएगा। उनकी सोच के हवाले से हिन्दुस्तान की रचनात्मक हैसियत को बढ़ावा देने में उनकी कलम का रोल था, वह हमेशा याद किया जाएगा। वे खास शैली के साथ जिंदा रहे, अच्छा लिबास पहनते थे, अच्छी बातें करते थे, शायरी और उनके जीवन में विनम्रता झलकती थी, कभी भी उन्होंने बड़े दावे नहीं किए। आजकल कम उम्र के लोग बड़े दावे करते हैं, यह देख कर दुख होता है। इस दौर में जब दिखावा ही सब कुछ हो गया है। मैं और मेरे जैसे लोग बेकल साहब का साथ छूटने के बाद खुद को बेहद अकेला महसूस करेंगे।

बेकल साहब ने विदेशों में भी हिन्दी शायरी की धाक जमाई। वे शायरी, गजल, गीत की दुनिया में आए और छा गए। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, इंग्लैंड और अमेरिका तक हिन्दी शायरी को ले जाने वाले वे पहले रचनाकार थे। जब लोग उर्दू शायरी को ही जानते थे, ऐसे में बड़े ही सशक्त तरीके से हिन्दी शायरी और गीतों को उर्दू के मंचों से विदेशों में पढ़ा तो लोग उनके गीतों में खो से गए। उनके साथ गुजारे जिंदगी के लम्हे हमेशा दिल में बसे रहेंगे। वह बहुत याद आएंगे।
(अखिलेश अवस्थी के साथ बातचीत के आधार पर)

Posted Date:

December 4, 2016

3:41 pm

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