बस्तियों में फलता फूलता रंगमंच

 

रंगकर्म को आम लोगों के साथ स्लम से जोड़ने की ऐतिहासिक पहल

देश के अलग अलग हिस्सों में तमाम रंगकर्मियों और संस्थाओं ने परंपरागत तौर पर भले ही विश्व रंगमंच दिवस मनाकर औपचारिकता पूरी कर ली हो, लेकिन इसका सबसे बेहतरीन आयोजन हुआ आगरा में। यहां रंगमंच को न सिर्फ ज़मीन पर उतारने की कोशिश हुई, बल्कि बस्ती के बच्चों के भीतर के कलाकार को निकालकर उसे निखारने की अद्भुत पहल हुई। अपने नाटकों की बदौलत रंगमंच को जनसरोकारों से जोड़ने और विलुप्त होती लोक शैलियों को जीवित करने की कोशिश में बरसों से लगी संस्था रंगलीला ने पूरे एक महीने तक बस्ती का रंगमंच नाम से जो अभियान चलाया, उससे तमाम बस्तियों में रहने वाले 100 से ज्यादा बच्चों और दूसरे लोगों को रंगमंच और नाटक के बारे में पता चला। रंगलीला ने 3 अप्रैल से 2 मई तक लगातार पूरे पूरे दिन बस्तियों में कार्यशालाएं कीं और बस्ती के बच्चों में गज़ब का उत्साह भर दिया। यहां रहने वाले बच्चे और इनका परिवार रोज़ की ज़द्दोजहद में ज़िंदगी की मुश्किलों के बीच भला अपने भीतर के कलाकार को कैसे पहचान सकते हैं, अपनी ऊर्जा को सही दिशा में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं और कैसे मिलकर एक खेल की तरह रंगमंच को समझ सकते हैं, नए नए नाटक तैयार कर सकते हैं, यह सबकुछ बस्ती के रंगमंच में उन्हें पता चला। बेहद जुझारू और रंगकर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित अनिल शुक्ला की परिकल्पना और कठिन मेहनत ने रंगमंच को नई परिभाषा दी है। अनिल शुक्ला और उनकी रंगलीला टीम ने इस दौरान स्लम के बच्चों को रंगमंच से जोड़ने और उनकी प्रतिभा निखारने की बेमिसाल कोशिश की।

रंगलीला ने इस दौरान बस्तियों में आयोजित अपनी कार्यशालाओं का जिस तरह ज़िक्र किया है उसकी कुछ बानगी हू ब हू आपके लिए… कई हिस्से कुछ लंबे भी हैं लेकिन पढ़ेंगे तो इस पहल और पूरे माहौल को समझने में मदद मिलेगी…

बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप (दूसरा दिन)

बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए सूरज का ऊजासा और खुली हवा, दोनों सपनों की मानिन्द हैं। वे जानते हैं कि ये दोनों चीज़े दुनिया में दूसरी जगहों पर तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी अपनी बस्ती में नहीं, लिहाज़ा जब और जहाँ उन्हें ये मिलती हैं वे सारी की सारी ‘हड़प’ जाना चाहते हैं। यही वजह है कि ‘विधवा आश्रम’ के हॉल में चलने वाली प्रदर्शन, अभिनय और नृत्य के अभ्यास की कक्षाओं से निकल कर शारीरिक अभ्यास के लिए जब उन्हें ‘आश्रम’ के 3 हजार स्क्वायर मीटर वाले लॉन में चलने को कहा जाता है तो उनके चेहरे पर अचानक उभर आये उल्लास को पढ़ने के लिए सभी पैमाने फेल हो जाते हैं।  सोनम, काजल, रंजीत और करन लाख कोशिश करें (उन्हें थोड़ा बहुत अनुशासनबद्ध करने की, ताकि भगदड़ में कहीं चोट न खा जाएँ) लेकिन सब बेकार। कमान से छूटे तीर की तरह वे लॉन की तरफ भागते हैं, देर तक जम कर उछलते-कूदते है, कलाबाज़ियां खाते हैं और तब अभ्यास के लिए वृत्त का गठन करते हैं।

बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप : पांचवा दिन (8 अप्रेल )

86 बच्चों की फौज! इस फौज का कहानी सुनाने का सिलसिला निर्वाध गति से जारी है। शुरुआती ‘कहानी पाठ’ जैसी यांत्रिकता से निकल कर अब वे सचमुच कहानी ‘सुनाना’ सीख रहे हैं। वर्कशॉप की निर्देशक टीम की सोनम वर्मा, काजल गुप्ता, रंजीत गुप्त, राम शर्मा और करन यादव उन्हें इस कला में पारंगत बनाने में जुटे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता वे उस परिवेश को ‘सूंघने’, ‘चखने’ और ‘बुनने’ की दिशा में आगे बढ़ने लगे हैं जो कहानी अपने इर्द-गिर्द रचती है। वे लकड़बग्घे और किसान, राजा-रानी, बंदर और मगरमच्छ आदि की पुरातन और परंपरागत कहानियों को लेकर, सीखकर आ रहे हैं। जो नहीं जुटा पा रहे हैं, वे अपराध बोध से ग्रसित दिखने लगते हैं। हम उन्हें अगले दिन कुछ सुनाने के लिए प्रेरित करते हैं। वे सहर्ष इसे मान लेते हैं। दरअसल मैं ‘कहानी कहने की कला’ को एक प्रशिक्षण औज़ार (ट्रेनिंग टूल) के तौर पर इस्तेमाल कर रहा हूँ। यह उनमें ‘भाव’ संयोजित करने का प्रशिक्षण है। भाव संयोजन करने में प्रवीण होना उन्हें सिर्फ अभिनय ही नहीं सिखाएगा, नृत्य और गायन को महसूस करके प्रस्तुत करने के लिए भी बाध्य करेगा। इतनी जल्दी उनमें ऐसे ज़बरदस्त कलात्मक बदलाव दिखने लगेंगे, इसे देखकर उनके प्रशिक्षक भी हैरान हैं। सोनम कहती हैं- “शुरू में मुझे उम्मीद नहीं थी कि ‘कहानी कहने’ का टूल इतना प्रभावशाली साबित होगा।” सोनम लम्बे समय से ‘रंगलीला की अभिनेत्री हैं और हमारी थिएटर वर्कशॉप में प्रशिक्षक के रूप में भी शामिल रही हैं। वे प्रशिक्षण के दूसरे तमाम टूलों से वाकिफ हैं। यह उनके लिए नया टूल है।

उन्हें श्वांस और ध्वनियों का अभ्यास भी कराया जा रहा है। वे इसमें खूब मज़े ले रहे हैं। वे पेट से आवाज़ें निकलने की एक्सरसाइज़ के वक़्त सबसे ज़्यादा चैतन्य दिखते हैं। ‘विधवा आश्रम’ का लॉन- वह तो उनकी अभ्यास स्थली कम, क्रीड़ा स्थली ज़्यादा दीखती है। यहाँ आकर वे अपना ‘मस्ती का रंगमंच’ सजाने में जुट जाते हैं !

दरअसल ‘रंगलीला बस्ती का रंगमंच’ और बस्ती के बच्चों की यह वर्कशॉप सिर्फ इन बच्चों को सिखाने का ही काम नहीं कर रही, मुझ सहित वर्कशॉप के सभी प्रशिक्षकों को भी नए सिरे से सीखने के लिए लैस कर रही है। मीडिआ में सेवारत एक पुराने रंगकर्मी मित्र ने पीठ ठोंकते हुए व्हाट्सएप पर लिखा-आप अलग तरह की समाज सेवा कर रहे हैं। मैंने तत्काल संशोधित करते हुए उन्हें लिखा- मैं समाज सेवा नहीं, अलग तरीके का रंगकर्म कर रहा हूँ । ……..हम सचमुच यही कर रहे हैं और बारम्बार यही सीखना चाहते हैं।

बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप : आठवां दिन (11 अप्रैल)

 

वर्कशॉप में बच्चों को एक हफ्ता पूरा हो चुका है। हापित हो चूका है। अब वे आपस में तो घुलमिल गए ही हैं, वर्कशॉप के परिवेश के साथ भी उनका तादात्म्य स्थापित हो गया है। अब वे जानने लगे हैं कि वे यहाँ क्यों आये हैं और यहाँ आकर उन्हें क्या सीखना है, क्या करना है। जिन्हें यहाँ मज़ा नहीं आ रहा था या जो यार-दोस्तों के कहने पर ‘यूँ ही’ चले आये थे, वे रुख़सत कर गए। अभी भी करीब 60 बच्चे मौजूद है। पिछले कई दिनों से उनकी रुचियों और उनके भीतर मौजूद ‘पोटेंशियल’ का आकलन चल रहा था। आज आठवें दिन निर्देशकों ने अलग-अलग टीमें बनायीं। एक्टिंग, डान्स और सिंगिंग के अलग किये गए। इनके कुछ प्रशिक्षण अभी सामूहिक चलेंगे और कुछ अलग-अलग। 2 नाटक इन्हें करने हैं। पहला नाटक अंधविश्वास और साफ़-सफाई को लेकर गढ़ी गयी एक दिलचस्प कहानी है जो राजदरबार से निकल कर सामान्य जन तक पहुँच बनाती है। ‘सुपरस्टीशन’ और ‘सेनिटेशन’ इसमें सामानांतर चलते हैं। कैसे, इसे जानने के लिए आपको प्रदर्शन देखना आना होगा। दूसरा नाटक स्त्री व्यथा को लेकर है। भ्रूण अवस्था से लेकर से लेकर वृद्धा हो जाने तक की भारतीय महिला की दमन यात्रा का वृतांत है इस की कहानी के मूल में। 14-15 बच्चों के समूह ने आज नाटक की अभ्यास कक्षा में बैठकर नाटक की रीडिंग की। ‘आश्रम’ के एक सिरे पर बैठे इनमें जो बच्चे निरक्षर या अल्प साक्षर होने के चलते स्क्रिप्ट नहीं पढ़ सकते, उन्हें उनके दूसरे साथी संवाद याद करने में मदद देंगे। रीडिंग के बाद बच्चों को स्पीच और बॉडी एक्सरसाइज़ के लिए लॉन में लाया गया। रंजीत और करन नाटक टीम के निर्देशक होंगे। वरिष्ठ रंगकर्मी योगेंद्र दुबे इस समूचे खंड की ‘देखभाल’ करेंगे। आश्रम के मुख्य हॉल में डान्स वालियां म्यूजिक और अपने पैरों की थिरकन से पूरे परिवेश के आकर्षण का बिंदु रहीं लेकिन उनके बारे में विस्तार से कल !

 बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप : तेरहवां दिन (16 अप्रैल 2017)

30 से ज़्यादा लड़कियां हैं जो वर्कशॉप में डान्स का सघन अभ्यास कर रही हैं। अपनी सोनम और काजल मैम के साथ वे ढाई घंटे से भी ज़्यादा नृत्य का पसीने में लथपथ होकर अभ्यास करती हैं। इनमें से कई ने पहली बार थिरकना शुरू किया है। नृत्य के अभ्यास को देखने दर्शकों का जमावड़ा खूब रहता है। इनमें सबसे बड़ी तादाद ‘विधवा आश्रम’ की संवासिनी ‘अम्माओं’ की है। अभ्यास कक्ष से जब ये लड़कियां बाहर निकलती हैं तो ‘अम्माएं’ भी उन्हें अपने किस्म का ‘कोच’ देती हैं। एक्टिंग में भाग लेने वाली कई लड़कियां भी डांस के लिए लालायित हैं लेकिन नाटक की रिहर्सल और शारीरिक व स्पीच के अभ्यास में ही वर्कशॉप के पूरे 3 घंटे कैसे बीत जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता।

वैसे तो हर युग में लड़कियों में डान्स का ‘क्रेज़’ रहा है लेकिन हाल के कुछ दशकों में यह दीवानगी जूनून की हद तक पहुँच गयी है। मैं देख रहा हूँ कि 21 वीं सदी की इन किशोरियों में डान्स की बड़ी ललक है। ‘वर्कशॉप’ में ऐसी भी कई लड़कियां हैं जो अपने को ‘पक्की डांसर’ डांसर मान कर आयी थीं लेकिन यहाँ आकर जब उन्हें पता चला की यह सिर्फ पैरों को थिरकाने की कला का मामला नहीं इससे आगे बढ़कर कुछ और भी है तो उन्हें बड़ा अचम्भा हुआ। शरीर के लचीलेपन से लेकर चेहरे की मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ और आँखों की गतियों के अभ्यास शुरू में उन्हें बेचैन कर रहे थे लेकिन अब वे समझने लगी है कि डान्स के लिए ज़रूरी 5 तत्वों में पैरों के मूवमेंट सिर्फ एक तत्व है। अब उन्हें यह अहसास हो रहा है कि आँखों और चेहरे के भाव के बिना डांस बेमतलब है। अब वे कमर मटकाने और गर्दन लचकाने की ‘मुश्किल’ गतियों के बीच से से गुज़र रही हैं। वे खुश हैं। ‘वर्कशॉप’ के समापन समारोह में आप जब इन्हें अमीर खुसरो, सूरदास और नज़ीर अकबराबादी के रचनाओं पर नाचते देखेंगे तो यक़ीन मानिये, नयी नकोरी नृत्यांगना होकर भी, वे आपको कतई ‘निराश’ नहीं करेंगी और बरबस आपसे आपका आशीष लूट लेंगी ! ‘वर्कशॉप न सिर्फ उनसे, बल्कि इनके माध्यम से उनके परिजनों और बस्ती के दूसरे तमाम दर्शकों से भी ब्रज अंचल के इन 3 महाकवियों का परिचय करवाने वाली है।

बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप:14 वां दिन(17 अप्रैल2017) 

-अरे द्वारपालो! कन्हैया से कह दो, कि दर पे सुदामा ग़रीब आ गया है

भटकते-भटकते न जाने कहाँ से, तुम्हारे महल के क़रीब आ गया ही।

उत्तर भारत के धार्मिक समागमों के बेहद चर्चित ‘पॉप सिंगर’ लखविंदर सिंह लक्खा का गया यह गीत देश की ‘जागरण’ और ‘भजन संध्याओं’ के सबसे लोकप्रिय गीतों में एक है। ‘वर्कशॉप’ के निर्देशक युवा रंगकर्मी राम शर्मा और ‘रंगलीला’ के संगीत निर्देशक गोपाल शर्मा इन दिनों वर्कशॉप के बच्चो को गायन और अभिनय के जरिये इस गीत को तैयार कर रहे हैं। शुरू में इस गीत के चयन का जब उन्होंने मुझसे कारण पूछा तो मैंने बताया (1) इस वर्कशॉप के बहुसंख्य बच्चे सुदामा की परंपरा के हैं। जाने-अनजाने इस-उस दर पर कन्हैया को ढूंढते निराश हो चुके इन बच्चों को 21 वीं सदी के भारतीय समाज में कन्हैया कहीं नहीं दीखते। यह गीत उन्हें कन्हैयाओं को ढूंढ निकालकर ‘उपलब्धि’ के नए द्वीप पर आसन जमाने की आशा दिखायेगा। (2) इस अत्यंत लोकप्रिय गीत के रचनाकार ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव थे जो ‘रंगलीला’ के ‘भगत नवजागरण आंदोलन’ के चीफ़ कमांडेंट थे और स्वयं भी निर्धन और निरक्षर सुदामाओं की जमात के थे। इस गीत के जरिये ‘वर्कशॉप’ के बच्चे लोक साहित्य के इस महान साधक को श्रद्धांजलि देंगे।

लम्बे समय से हमारे देश में साहित्य आलोचना का भीषण भुखमरी की शिकार है, लोक साहित्य तो उससे क्या अपेक्षा करे! ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव बीसवीं सदी के ब्रज अंचल के ऐसे कबीर थे जिन्होंने निरक्षर होने के बावजूद लोक साहित्य के विपुल भंडार की रचना की। बोल-बोल कर लिखवाई गयी 12 भगत, सैकड़ों लोक गीत, इतने ही ‘ख़यायलगोई’की लावनियाँ, होली और न जाने क्या-क्या। 3 दशक पहले उन्होंने लक्खा को यह गीत भेंट किया जिसे गाकर उसने देश के मुख्य धार्मिक गायकों की सबसे आगे की कतार में अपनी जगह बनायीं। धार्मिक गीतों और भजनों की संस्कृतनिष्ठ हिंदी को धता बताते हुए उन्होंने इसे लोक भाषा में रचा जिसमें’ ग़रीब’, ‘क़रीब’, ‘नसीब’,’मेहमान’, ‘अचम्भा’ ख़ुशी का समां’ जैसी आम हिंदुस्तानी ज़बान का इस्तेमाल है (जो ख़लीफ़ा की खुद की भाषा भी थी) और यही भाषा इसकी लोकप्रियता का सबब बनी। यह बात दीगर है कि बतौर गुरु दक्षिणा, गीत के रचनाकार का नाम सार्वजनिक करने में लक्खा ने भारी कृपणता बरती। दरियादिल ख़लीफ़ा को इसका रत्ती भर भी मलाल नहीं था। वह भीतर से इतना ‘भरे’ थे और जानते थे कि उन्होंने बिना किसी ‘आस’ के ऐसे पचासों गीतों की रचना की है। उनका लिखा ‘देखें को ले जाय चुराय, मेरे बाबुल का बीजना’ ऐसा ही एक लोक गीत है। सन 1960 के दशक से लेकर आज तक, करौली की ‘जात’ में जाने वाली ब्रज अंचल की लाखों महिलाएं इसे पूरी धार्मिक यात्रा में गाते हुए जाती हैं, बिना यह जाने कि इसका रचनाकार कौन था। 1970 के दशक में देश की ऑडियो रिकॉर्ड बनाने वाली वाली सबसे बड़ी कम्पनी- ‘एचएमवी’ ने धृष्टता की और रचनाकार का नाम दिए बिना गीत को ‘लोक गीत’ के रूप में बाज़ार में उतार दिया था। निरक्षर ख़लीफ़ा के पास लोक भाषा का अप्रतिम भंडार था। देश के विभिन्न मंचों पर सुप्रसिद्ध गायक राजू बावरा जिस समय माइक पर “अपने गुरु” (ख़लीफ़ा का नाम लेते हुए) का लिखा गीत ‘हमें तो लूट लिया दाऊ जी के भैया ने, कृष्ण कन्हैया ने, बांसुरी बजैया ने’ गाते हैं तो हज़ारों की भजन संध्याएं “वाह” “वाह” में डूब जाती है। इस गीत में भी भाषा पूरम्पूर हिंदुस्तानी है। अंतरा देखें- सुहानी रात थी और चांदनी भी छायी थी, सलोने श्याम ने जब बांसुरी बजायी थी। अनोखी तान परम ज्योति जगमगाई थी……. ( लोक कवि जन नेता कृष्ण का ही ‘फ़ैन’ है, वह ‘अभिजात्य’ देवताओं को अपने आराध्य के सामने समर्पण करवा देता है) ‘……. सलोने श्याम ने जब बांसुरी बजायी थी, अनोखी तान परम ज्योति जगमगाई थी। सुनकर स्वरों से लताओं के गले झूम उठे, उधर ब्रह्म्मा विष्णु सृष्टि का ज्ञान भूल उठे। सभी देवों ने मिलके ये ही कहा, हमें तो लूट लिया दाऊ जी के भैया ने……. ‘

‘द्वारपालों’ वाले गीत की प्रस्तुति देने वाले सुदामा की नयी पीढ़ी के ये बच्चे इस मायने में पूरम्पूर ‘ईमानदार’ साबित होंगे। वे इस गीत को उसके रचनाकार का नाम लेकर गाएंगे, अभिनीत करेंगे और उसे अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे ! ऐसा करके वे यह भी सीखेंगे कि उनमें से यदि आगे कोई ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव जन्म लेता है तो उसे ‘रॉयल्टी’ के अपने अधिकार का अहसास रहे।

 बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप: बीसवां दिन (23 अप्रैल,2017)

आज रविवार होने के चलते हर बार की तरह बस्ती के बच्चों की वर्कशॉप सुबह 6 से 9 बजे तक थी। आज की शाम हमने बच्चों के अभिवावकों से मिलने लिए सुनिश्चित की थी। आज 20वां दिन था। मैं और ‘वर्कशॉप’ के युवा प्रशिक्षकों की टीम पहली बार बच्चों के अभिवावकों से मिलने जा रही थी इसलिए सभी बड़े ‘एक्साइटेड’ थे। हम जानना चाहते थे कि वे बताएं कि क्या इन 20 दिनों में उन्होंने अपने बच्चों में किसी किस्म के बदलाव को महसूस किया कि नहीं।

मीटिंग शाम 6 बजे रखी गयी थी। जैसी कि उम्मीद थी, शामिल होने आधे अभिवावक ही आए। हमारे सामने यह स्पष्ट था कि 50 फीसदी घरों में ही यह जानने की जिज्ञासा है कि उनके बच्चों ने ( अपनी पहल पर) जो नया ठिकाना बनाया है, वहां के ‘ठिकानेदार’ आखिर कौन लोग हैं और वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। अपने बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा (भले ही वह कलात्मक और सांस्कृतिक ही क्यों न हो) के प्रति एकाउंटबिलिटी (जवाबदेही) का पता करने की इच्छा ही उन्हें खींच कर इस मीटिंग तक ले आयी थी। बाकी के लिए चूंकि यह ‘निःशुल्क’ मामला’ था, इसलिए जवाबदेही (जानने) की कोई दरकार नहीं थी। उपस्थित जनों में ज़्यादातर माताएं थीं। कुछेक को छोड़कर ज़्यादातर गृहणियां (हाउस वाइव्स) थीं। पिताओं की तादाद कुल उपस्थिति का 1/5 भी नहीं थी।इससे इतना तो तय हो जाता है कि शहरी बच्चों के किसी भी प्रकार के विकास के प्रति पिताओं की तुलना में माताएं अधिक चैतन्य हैं। इस मामले में मुझे ‘रंगलीला’ की एक प्रशिक्षक की टिप्पणी बड़ी अच्छी लगी- पापाजी लोग बच्चों के बड़े हो जाने के बाद ही यह हिसाब लगाते हैं कि (यदि बेटा है तो) क्या लाया और (बेटी है तो) कितना ले गयी!

बच्चों ने ‘वर्कशॉप’ में दाखिल होने के लिए जो फॉर्म भरें हैं, वे दर्शाते हैं कि बस्तियों में रहने वाले इन बच्चों के परिवारों में आर्थिक रूप से 30 प्रतिशत मध्य वर्ग के हैं जबकि बाकी 70 फीसदी बच्चे निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्गों से आते हैं। 90 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में जाते हैं। बच्चों की मार्फ़त भेजे मौखिक ‘एजेंडे’ में हमने उन्हें सिर्फ इतना कहलवाया था कि हम लोग उनसे मिलना चाहते हैं। मीटिंग की औपचारिक शुरूआत से पहले तक अभिवावकों ने बिलकुल चुप्पी ओढ़ रखी थी। वे शायद इस ‘रहस्य’ को ‘सूंघने’ की कोशिश कर रहे थे कि हमने आखिर ये मीटिंग क्यों बुलाई है। एक बार मीटिंग शुरू हो जाने के बाद जब वे यह जान सके कि हम लोग सरकार से मिले किसी ‘फण्ड’ को निबटने के लिए ‘निःशुल्क’ कार्यशाला चलाने वाले एनजीओ नहीं बल्कि कुछ सिरफिरे और जुनूनी किस्म के लोग हैं जो अभिजात्य वर्गों के बच्चों तक सीमित रह गयी संस्कृति की धारा को खींच कर अंधेरी बस्तियों तक ले जाने को बेचैन हैं तो वे कुछ ‘रिलेक्स्ड’ हुए। उन्होंने अपने बच्चों की शिकायतें शुरू कीं। बच्चों के पास अपनी जिज्ञासाएं थीं जिन्हें उन्होंने (संभवतः इतना खुल कर आज पहली बार) उनके सामने पेश कीं।

 

 

Posted Date:

May 5, 2017

11:36 pm

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