इनकी चादर मैली नहीं होगी !

 पंजाब के रंगमंच को करीब से देखिए…

पंजाब के साहित्य और वहां के लोक रंगमंच की परंपरा काफी पुरानी और समृद्ध रही है। पंजाबी रंगमंच की जननी मैडम नौरा रिचर्डस और प्रो. आईसी नंदा को माना जाता है जिन्होंने 103 साल पहले छह अप्रैल, 1914 को पंजाबी नाटक ‘दलहन’ का मंचन सबसे पहले लाहौर के दियाल सिंह कालेज में किया था। इंकलाब के इस दौर में पंजाब के रंगमंच पर भगत सिंह के दर्शन का असर साफ दिखाई देता था। पंजाब की ज़मीनी समस्याओं के साथ साथ वहां की क्रांतिकारी परंपरा की झलक वहां के साहित्य और रंगमंच में देखी जा सकती है। सुरजीत पातर हों या वहां के जन नाट्यकार गुरुशरण सिंह, इनकी रचनाओं और प्रस्तुतियों में जो तेवर देखने को मिलता है, उससे आज की पीढ़ी को सीखना चाहिए। इसी संघर्ष और कलायात्रा को जारी रखने का काम कर रहे हैं पंजाब के मशहूर रंगकर्मी  सैमुअल जॉन। सैमुअल की कलायात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार और कलाकार देव प्रकाश चौधरी ने अमर उजाला में एक लेख लिखा था। 7 रंग के पाठकों के लिए हम उनका वह लेख फिर से पेश कर रहे हैं। इससे आपको पंजाबी रंगमंच के साथ साथ सैमुअल को भी जानने समझने में मदद मिलेगी।  

सैमुअल जॉन की रंगयात्रा

पंजाब के गांवों में एक चादर फैलती है और लोग उम्मीदों की मुट्ठी से कहीं ज्यादा अनाज उसमें डाल देते हैं। यह न तो चंदा है, न दान और न ही कोई शुल्क । यह रंगमंच को जिंदा रखने, उसे घर-घर पहुंचाने और उसे समाज के सच और झूठ को जानने देने का एक आत्मीय बंधन है, जिसकी एक डोर मशहूर फिल्मकार और रंगकर्मी सेम्युअल जॉन के हाथ में है तो दूसरे छोर पर हैं गांवों के हजारों गरीब, अनपढ़ और पिछड़े लोग।

मैकबेथ का खूनी अंत, ब्रेख्त की राजनीति, सुरजीत पातर की कविताएं और बच्चों की दर्जनों कहानियां इन दिनों पंजाब के गांवों की हवाओं में सांस ले रही हैं। कटते गेंहू और फिर धान के लिए तैयार होते खेतों के लिए किसानों और मजदूरों की आपसी बतकही के बीच लोगों को अचानक डफली की ताल के साथ ब्रेख्त के गीत सुनाई पड़ते हैं -“शार्क से तो मैं बच आया/शेरों को मैंने छकाया/मुझे जिन्होंने हड़प लिया/ वे तो खटमल थे…।” तो क्या पंजाब के गांव किसी क्रांति की तैयारी कर रहे हैं? जवाब देते हैं,मशहूर पंजाबी अभिनेता और रंगकर्मी सेम्युअल जॉन-” क्रांति तो बड़ा शब्द है। हमलोग उम्मीद पर टिके हैं। यह रंगमंच से खुद को बदलने का एक इमानदार प्रयास है। पहले खुद, फिर समाज और गांव और उसके बाद राज्य और देश की बारी। इसके लिए रंगमंच को घर-घर जाना होगा या फिर लोगों को रंगमंच के पास आना होगा। ये दंभ नहीं,  साथ जुड़े उनलोगों का विश्वास है, जो समानता की चादर पर बैठना चाहते हैं।”

 

सेम्युअल जॉन की इस रंगयात्रा में चादर एक आसमान की तरह उनके साथ रहा है। बिछ गई तो बैठने की जगह बन गई, तन गई तो मंच बन गई, फैल गई तो आने वाले कल के लिए उम्मीद बन गई। लेकिन पटियाला से रंगमंच में ग्रेजुएट जॉन के लिए जब मुंबई से बार-बार संदेशा आता हो..तो फिर वह संगरूर इलाके के ठेठ गांवों में क्या कर रहे हैं? शायद पिछले 15 सालों में सेम्युअल ने कई बार ऐसे सवालों के जवाब दिए हैं। चेहरा पर एक मुस्कान तैरती है,” थियेटर की पढ़ाई के बाद मुंबई गया था। पहली फिल्म मिली ‘ढूढते रह जाओगे’। कॉमेडी थी। काम अच्छा किया था तो और भी ऑफऱ मिले मिले। वहां मैं गोरेगांव इस्ट में रहता था। सामने एक झोपड़पट्टी थी। मुझे लगा कि यहां रहने वाले बच्चों के साथ कुछ करना चाहिए। साधन नहीं के बराबर थे, फिर भी मैंने उन छोटे घरों के बच्चों को साथ लेकर थियेटर करना शुरु कर दिया। फिर गांव की याद आई, वापस आ गया। अब यहां गांववालों के साथ रंगमंच को जोड़कर कुछ नया कर रहा हूं। ”

सेम्युअल मुंबई जाना नहीं चाहते तो मुंबई को ही यहां आना पड़ता है। पंजाबी फिल्मों को बार बार जॉन की जरूरत पड़ती है। कुछ दिन पहले ही आई उनकी फिल्म ‘अनहे गोरे दा दान’ ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा बटोरी है और कई पुरस्कार जीते हैं। इसके पहले आई मिका की फिल्म ‘माटी’ और राजीब शर्मा की फिल्म ‘आतुखोजी’ और मनदीप की फिल्म ‘साडा हक’ के लिए भी जॉन को याद किया जाता है। लेकिन जॉन की यादों में तो अब सिर्फ लैहरागागा गांव बसा हुआ है, जहां वह अपने रंगमंच ‘पीपुल थियेटर’ के साथ जीते हैं और जीना चाहते हैं। संगरूर जिले के इस बेहद पिछड़े गांव में जॉन ने एक ओपन थियेटर की भी स्थापना की है, जिसमें लगभग 400 लोग एक साथ बैठकर रंगमंच का आनंद लेते हैं।

“असली आनंद तो तब है, जब लोग जाति के भेदभाव से उपर उठकर जीएं और लोगों को जीने दें। पहली बार जब मैंने समानता की बात की थी तो मेरे पास कुछ कॉमरेड आए थे और मुझे एक किस्म से लगभग दवाब देते हुए समझाया था कि यह जाति-वाति का चक्कर छोड़ो और मुंबई जाकर कैरियर बनाओ। मैं उनके चक्कर में नहीं आया और मुझे संतोष है कि आज इलाके के छोटे किसान, गरीब और अनपढ़ लोग, छोटे स्कूलों के बच्चे और इमानदारी से रोजी रोटी कमा रहे सैकड़ों लोग मेरे साथ हैं और रंगमंच के जरिए समाज को बदलने का जो सपना देखा है, उसे सच करने में जुटे हैं,” ठेठ पंजाबी पोशाक में एक आम किसान की तरह नजर आने वाले जॉन को देख-सुनकर यकीन करना मुश्किल है कि इस शख्स को चाहने वाले दुनिया के कई मुल्कों में हैं।

साझा चूल्हे की तरह साझा संस्कृति की बात करने वाले जॉन अक्सर सुबह स्कूलों के चक्कर लगाते हैं, दोपहर खेतों में बिताते हैं और शाम को मजदूर बस्तियो में जाते हैं। न माइक और न ही मंच पर कोई साज सज्जा। पहले कोई गीत और फिर बुलंद आवाज के सहारे नाटक शुरु। अभिनेता भी वे, जो थोड़ी देर पहले खेतों में कुदाल चला कर आए हैं, या फिर वह महिला, जो नाटक के तुरंत बाद गोबर के उपले इकट्ठा करने चल देगी। चाहे वह बेख्त का कोई नाटक हो, शेक्सपियर का कोई टुकड़ा हो नाटक या फिर आंबेडकर की जीवन गाथा हो, 15 मिनट में नाटक की तैयारी पूरी और फिर आधे घंटे तक पूरा वातावरण मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहता है। नाटक के बाद जॉन के दल के लोग चादर फैलाते हैं, लोग उम्मीदों की मुट्ठी से कहीं ज्यादा अनाज उसमें डाल देते हैं। लोगों की यही उम्मीद समानता की इस चादर को मैली होने से बचाती रही है।

— देव प्रकाश चौधरी

Posted Date:

October 12, 2017

1:46 pm Tags: , , , , , ,

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