इतने रंग एक साथ – ‘नाद रंग’ पढ़िए

बाज़ारीकरण के इस दौर में एक बेहतरीन सांस्कृतिक पत्रिका

मुख्य धारा की पत्रकारिता में हाशिए पर पहुंच चुकी कला और संस्कृति को लेकर जब आप किसी से बात कीजिए तो वह गंभीर सा चेहरा बनाकर कुछ चिंता ज़रूर जता देगा, लेकिन जब आप किसी से इस बारे में लिखने का आग्रह कीजिए तो आपको एक खोखले आश्वासन के सिवा जल्दी कुछ नहीं मिलेगा। इस गंभीर स्थिति और शून्यता के बीच अगर आपको रंगमंच और कला पर कोई पत्रिका दिखे तो कुछ ताज्जुब भी होता है और एक सुकून का एहसास भी। आज के दौर में लघु पत्रिका और खासकर इस विषय पर केन्द्रित एक पत्रिका निकालने की हिम्मत जुटाना आसान काम नहीं। लेकिन युवा पत्रकार आलोक पराड़कर की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपने इस जज़्बे को बरकरार रखते हुए ‘नाद रंग’ निकालने का साहस किया। व्यावसायिकता और बाज़ारीकरण के इस दौर में पत्रिका निकाल पाना और उसे चला पाना कठिन चुनौती है और खासकर तब भी जब ‘डिजिटल युग’ और ‘मोबाइलीकरण’ ने लिखने पढ़ने का नज़रिया ही बदल दिया हो और लोगों की आदतें बदल दी हों।

‘नाद रंग’ के पहले अंक का एक हिस्सा उत्तर प्रदेश के रंग परिदृश्य पर समर्पित है। यहां आपको प्रदेश के कई शहरों के रंगमंच का हाल, वहां की नाट्य परंपरा और छोटे शहरों के युवा रंगकर्मियों के बारे में पता चल जाएगा। आम तौर पर लखनऊ, वाराणसी और इलाहाबाद के रंगमंच को लेकर कभी कभार छिटपुट रिपोर्ट दिख जाती है लेकिन बरेली, शाहजहांपुर, मथुरा, आज़मगढ़ या अन्य इलाकों में क्या हो रहा है, यह कम ही पता चल पाता है। लेकिन आपको यहां संक्षेप में ही सही लेकिन इन शहरों के रंगमंच को लेकर ठीकठाक सामग्री मिल जाएगी। राजेश कुमार खुद एक बेहतरीन लेखक हैं और उनके नाटकों का अपना संसार है। उन्होंने लखनऊ के रंग परिदृश्य को बेहद बारीकी से पकड़ा है और अगर वह लखनऊ के रंगमंच और रंगकर्मियों को भूलभुलैए में भटकते देखते हैं तो इसके पीछे उनके तर्क हैं। अपने आलेख में राजेश यह बताने की कोशिश करते हैं कि कैसे यहां की संस्कृति और नाट्य परंपरा का एक समृद्ध इतिहास रहा है, चाहे वो दास्तानगोई हो या फिर पारसी नाटकों का संसार या फिर भारतेंदु युग हो या फिर समसामयिक नाटकों का वो क्रांतिकारी दौर। फिर सरकारी अनुदानों से लेकर सत्ता की संस्कृति के बीच फंसे यहां के रंगकर्मियों और संस्थाओं के बीच कैसे नाटकों से वो सरोकार खत्म हो रहे हैं, राजेश कुमार के लेख में इसे विस्तार से बताने की कोशिश की गई है।

शालिनी वाजपेयी ने बरेली के रंगमंच की बेहद सकारात्मक तस्वीर खींची है। उन्होंने ये बताने की कोशिश की है कैसे बीसवीं सदी से शुरू हुई यहां की रंगमंच परंपरा राधेश्याम कथावाचक औऱ जे सी पालीवाल से होती हुई युवा रंगकर्मियों और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रतिभाओं तक आ पहुंची है। माहौल बेशक बदला है लेकिन वक्त के साथ तकनीक और प्रोफेशनलिज़्म का भी विस्तार हुआ है। वहीं सुनील मानव ने ये बताने की कोशिश की है कि शाहजहांपुर को इस मामले में कम न समझा जाए और इस छोटे शहर में किस तरह बड़ा रंगमंच आकार लेता है, इसकी कई मिसालें हैं। वहीं वाराणसी के रंगमंच पर कुंवरजी अग्रवाल और कुमार विजय ने संक्षेप में ही सही लेकिन कई नामों के ज़रिये ये बताने की कोशिश की है कि किस तरह काशी की परंपरा को कुछ लोग बचाने और आगे बढ़ाने में लगे हैं, कुछ सरकारी कोशिशों के ज़रिये तो कुछ निजी संस्थाओं और कलाकारों के ज़रिये। चुनौतियां तमाम हैं लेकिन संभावनाएं बरकरार हैं। मथुरा के रंगमंच पर हनीफ मदार ने विस्तृत विश्लेषण किया है और बताया है कि कैसे यहां रासलीला, संगीत परंपरा, नौटंकी, लोकगायन के पारंपरिक शैलियों के साथ आधुनिक रंगमंच अपनी उपस्थिति बनाए रखने का संघर्ष करता है और कैसे यहां भी समसामयिक मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक खेले जा रहे हैं। वहीं अभिषेक पंडित ने आज़मगढ़ में और अनुपम आनंद ने इलाहाबाद में रंगमंच की परंपरा से लेकर आज के दौर में खेले जा रहे नाटकों और सक्रिय रंगकर्मियों का विस्तार से हवाला दिया है। अभिषेक और अनुपम ने आज़ादी के पहले के दौरान खेले जाने वाले नाटकों और उसके असर के साथ साथ आज के दौर के नाटकों का भी ज़िक्र किया है। स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, वीर अभिमन्यु जैसे नाटकों के साथ साथ ब्रेख्त के नाटक खड़िया का घेरा और असगर वजाहत के नाटक गोडसे डॉट कॉम के मंचन के बारे में भी बताया गया है। बेशक रंगमंच की यात्रा बहुत लंबी है और इसके कई आयाम हैं लेकिन किसी पत्रिका के लिए पहले ही अंक में इतना सबकुछ एक साथ उपलब्ध करा देना एक उपलब्धि है।

रंगमंच के अलावा नाद रंग में कला की भी विस्तृत पड़ताल की गई है। खुद एक कलाकार और पत्रकार देव प्रकाश चौधरी ने अपर्णा कौर की कलायात्रा पर बहुत काम कर रखा है। उन्होंने इस पत्रिका के लिए भी अपर्णा की कला पर एक बेहतरीन लेख लिखा है, साथ ही अपर्णा से उनकी विस्तृत बातचीत कला के कई आयामों को खोलती है। वहीं जतिन दास और शाहिद परवेज़ जैसे कलाकारों से बातचीत, कलाकार सैयद हैदर रज़ा पर रेखा के. राणा का लेख, चित्रकार शरद पांडे की स्मृति में नवीन जोशी और नंद किशोर खन्ना के आलेख। कुल मिलाकर एक साथ इतना कुछ जिससे कला के बेहद विस्तृत कैनवास का पता चल सके।

रंगमंच और कला के साथ साथ यहां संगीत भी है और वह भी विस्तार से। ज़ाकिर हुसैन भी हैं, सितारवादक और एक नए वाद्य जिटार के जन्मदाता नीलाद्रि कुमार भी हैं, शाहिद परवेज़ भी हैं, बनारस घराना भी है और वो सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों का कला कलरव भी।

‘नाद रंग’ जैसी पत्रिका नियमित निकलती रहे, आलोक पराड़कर का जज़्बा बरकरार रहे और कला-संस्कृति-संगीत-रंगमंच के विशाल संसार को इसी तरह समेटने की कोशिश होती रहे, ‘7 रंग’ यही चाहता है। बहुत शुभकामनाएं।

Posted Date:

October 4, 2017

5:07 pm Tags: , , ,

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