‘अमर उजाला’ की साहित्यिक पहल ‘बैठक’

मीडिया से लगभग गायब हो चुके साहित्य और साहित्यकारों को अगर कोई हिन्दी अखबार मंच दे और आज के दौर में पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़े तो बेशक इसके लिए वह बधाई का पात्र है। उत्तर भारत के सबसे विश्वसनीय अखबार अमर उजाला ने ऐसी ही पहल की है। साहित्यकारों से संवाद तो गाहे बगाहे होते रहे हैं, उनके इक्का-दुक्का इंटरव्यू भी छपते रहे हैं लेकिन समकालीन साहित्यिक-राजनीतिक परिवेश में उनसे खुलकर बहस करने, उनके नज़रिये को सुनने, उनके सुख-दुख, अनुभव और लेखन संसार को साझा करने की ऐसी कोशिश नहीं होती। अमर उजाला ने ऐसी ही एक ऋंखला शुरू की है – बैठक

इसमें हर बार दो जाने माने साहित्यकारों की वैचारिक जुगलबंदी, वाद-विवाद और लेखन की चुनौतियों की पूरी गुंजाइश बरकरार रखी गई है। इस ऋंखला की पहली कड़ी में जाने माने कवि, विवादास्पद प्रशासक रहे और देश के सांस्कृति परिदृश्य की नई इबारत लिखने वाले अशोक वाजपेयी के साथ सुप्रसिद्ध आलोचक और लेखक सुधीश पचौरी का दिलचस्प संवाद सुनने को मिला। हिन्दी साहित्य से जुड़ी ऐसी बैठक-ऋंखलाओं की अवधारणा को अमर उजाला के सलाहकार और वरिष्ठ लेखक यशवंत व्यास रोशनदान की रोशनी की तरह देखते हैं। उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं में साहित्य, कला और संस्कृति के रोशनदान से जो धूप और हवा मिलती है, उसे महसूसने की शक्ति खत्म हो जाएगी अगर हमने रोशनदान में पुराने जूते, चाकू और भय का कबाड़ रखकर उस रास्ते को बंद कर दिया। अखबारों का एक काम उस कबाड़ को हटाना और उस रोशनी के रास्तों को बनाए रखना भी है। और इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पहल से रोशनदान अबाध होगा, नई खिड़कियां भी खुलेंगी और दरवाज़े भी जिन्हें आप खोलना चाहते हैं।

अब इस ‘जुगलबंदी बैठक’ की कुछ झलकियां देखिए —

पुरस्कार वापसी विरोध का एक नाटकीय ढंग था…’

सुधीश पचौरी – अशोक जी, आपलोगों ने बड़े ज़ोर शोर से जिस असहिष्णुता के मुद्दे को उठाया था, वो अब कहां चला गया…क्या अब सबकुछ ठीक हो गया…

अशोक वाजपेयी – हमलोगों ने जब पुरस्कार वापसी को लेकर सोचा था.. अव्वल तो किसी से किसी ने बात नहीं की.. सबसे पहले उदय प्रकाश ने ऐसा किया, फिर नयनतारा सहगल ने किया.. उसी समय इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार ने फोन पर इसपर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही.. तबतक मैंने इसपर कोई विचार नहीं किया था… .. तभी मैंने कहा कि अगर नयनतारा सहगल ने कर दिया तो मैं भी अपना पुरस्कार वापस करता हूं…. ये एक नाटकीय ढंग था जिससे देश का ध्यान देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता की तरफ खिंचे…हम जब राष्ट्रपति से मिलने गए तो उन्होंने आते ही कहा कि आपलोगों को बधाई कि आपलोगों ने असहिष्णुता के मुद्दे को राष्ट्रीय एजेंडे पर ला दिया, नारायणमूर्ति ने भी यही कहा, रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने भी यही कहा.. जाहिर है पहली बार लेखक अखबारों के पहले पन्ने पर आए, नहीं तो मरने के बाद भी नहीं आते हैं…

सुधीश पचौरी – लेकिन अशोक जी, देश में जब आपातकाल लगा.. तब आपने कोई विरोध नहीं किया..

अशोक वाजपेयी – मैं सरकार में था…

सुधीश पचौरी – एक मिनट सुनिए, अरे बाबा, विरोध का तो मोर्चा वही था न.. सरकार छोड़ देते आप.. मोर्चा तो लेना होता है..आपने सुरक्षित मोर्चा लिया..

अशोक वाजपेयी – हम कोई योद्धा नहीं हैं, हां, सुरक्षित मोर्चा लिया, क्यों नहीं लूं.. मैं कोई विद्रोही कवि नहीं हूं…ऐसे मौके आते हैं जब आपको नागरिक मोर्चे पर कुछ करना होता है.. मैं बीसियों साल से ये मानता रहा हूं कि कविता पर्याप्त नागरिकता है, उसके अलावा एक कवि से उम्मीद करना बेकार है, वो कविता लिखता है ये एक नागरिक काम है, उससे ये उम्मीद करना कि वो हर चीज़ का विरोध करे, हर चीज़ में शामिल हो, मोर्चा ले.. ज़रूरी नहीं है.. संघर्ष तरह तरह के होते हैं…

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यहां हर दिन दूसरे बनाए जा रहे हैं ‘

सुधीश पचौरी – मोदी को थोड़ा संक्षेप में परिभाषित कीजिए.. वो क्या हैं.. फासिस्ट हैं, अर्ध फासिस्ट हैं, निरंकुशतावादी हैं या डेमोक्रेटिक हैं… कौन हैं

अशोक वाजपेयी – फासिस्ट

सुधीश पचौरी – लेफ्टिस्टों के बीच ये डिबेट है कि वो फासिस्ट हैं, अर्ध फासिस्ट हैं या क्या हैं… आपने ये कैसे सिद्ध किया कि वो फासिस्ट हैं…

अशोक वाजपेयी – क्योंकि हर दिन ‘दूसरे’ बनाए जा रहे हैं.. गोमांस खाने वाले दूसरे हो गए…मांस खाने वाले दूसरे हो गए, सारे मुसलमान दूसरे हो गए, आदिवासी दूसरे हो गए, तथाकथित आतंकवादी दूसरे हो गए.. तो ये जो हर दिन दूसरे बनाए जा रहे हैं… फासिस्ट वृत्ति का मूल क्या है.. ये दूसरे हैं और इन दूसरों से निपटने का एक ही तरीका है कि उन्हें नष्ट कर दो.. लेकिन यकीन मानिए कि भारत में अभी भी भारत में लोकतंत्र बचा हुआ है…अभी भी संविधान बचा हुआ है.. अभी भी न्यायालय बचे हुए हैं…इसलिए अभी भी मुझे ये छूट है कि मैं प्रधानमंत्री के बारे में अपनी राय रख सकता हूं.. इसलिए यह नहीं कह सकता कि मोदी लोकतांत्रिक नहीं हैं..

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इस्लाम नहीं, हिन्दुओं के लिए ज़्यादा बड़ा ख़तरा है संघ

सुधीश पचौरी – राष्ट्रवाद के बारे में आपकी क्या राय है… ये जो इस्लामिक खतरा है, वो कल्पित है या यथार्थ है.. हिन्दू राष्ट्रवादी उसे जिस रूप में देखते हैं क्या वो ठीक है…

अशोक वाजपेयी – मेरी ये राय बहुत शुरू से रही है और अब पक्की हुई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस्लाम के लिए खतरा नहीं है… ज्यादा बड़ा खतरा हिन्दुओं के लिए है…क्योंकि उसकी जो अवधारणा है उसका हिन्दू चिंतन, हिन्दू अवधारणा या हिन्दू दर्शन से कोई संबंध नहीं है.. संबंध अगर है भी तो बहुत शिथिल संबंध है… भारतीय परंपरा को आप बहुलता और असहमति के बिना सोच ही नहीं सकते… अगर हिन्दू धर्म इतना सर्वज्ञ और सर्वसंतोषकारी होता तो बौद्ध धर्म क्यों पैदा हुआ, जैन धर्म क्यों पैदा हुआ, सिख धर्म क्यों पैदा हुआ, ये सब हिन्दु अनुष्ठान परंपरा से असहमति के कारण पैदा हुए.. और देखिए बौद्ध और जैन धर्म में तो ईश्वर की परंपरा ही नहीं है… इसलिए हमारे यहां ये जो राष्ट्रवाद है, उसका भारतीय राष्ट्रवादी चिंतन से कोई संबंध ही नहीं है…

सुधीश पचौरी – लेखक या कवि होने के नाते आपके पास ऐसा क्या औजार है कि आप इन चीजों के बारे में जनता को बता सकें…

अशोक वाजपेयी – अब आप ये चाहते हैं कि मैं जो जिन्दगी भर करता रहा हूं.. अच्छी बुरी जैसी भी कविताएं लिखता रहा हूं.. उसको एक नागरिक अभियान में जुटा दूं… मैं ऐसा नहीं चाहता.. क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरी सीमाएं हैं..  मैं जो कुछ नागरिक के नाते कर सकता हूं वो नागरिक के नाते करता हूं और जो कवि के नाते कर सकता हूं वो कविता के नाते करता हूं… मैंने 2009 से जब सत्ता पर लिखना शुरू किया तब से 2017 तक की टिप्पणियां में मैंने जुटा ली हैं… जो ‘अपने समय में’ नाम से प्रकाशित हुई हैं..  और इससे अधिक मैं देश के ज्यादातर हिस्सों में, भाषाओं में अपनी इस असहमति के स्वर की वजह से बुलाया जा रहा हूं… और वहां मैं यही बात फिर से दोहरा देता हूं…कि आरएसएस इस्लाम के लिए खतरा नहीं है बल्कि हिन्दुओं के लिए उससे भी बड़ा खतरा है…

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जीवन आपको ज्यादा देर एबनॉर्मल सिचुएशन में नहीं रहने देता 

यशवंत व्यास – एक तरफ तो आप यूनियन कार्बाइड हादसे के वक्त ये कह देते हैं कि मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता और दूसरी तरफ अर्जुन सिंह को संवेदनशील मुख्यमंत्री का दर्ज़ा भी दे देते हैं…

अशोक वाजपेयी – मैंने नहीं कहा अर्जुन सिंह को संवेदनशील, किसी ने कहा हो तो कहा हो.. न तो अर्जुन सिंह को इसकी ज़रूरत थी कि वो प्रगतिशीलों को साथ रखें या कलावादियों को साथ रखें… अर्जुन सिंह ने संस्कृति के क्षेत्र में जो कुछ किया वो मेरी सलाह पर किया… इसलिए कि उनको लगता था कि इस क्षेत्र में कुछ करना चाहिए… दूसरी बात, उन्होंने कभी हस्तक्षेप नहीं किया… मैंने उनसे कहा था कि हमारे मंचों से आपकी सरकार की, इंदिरा गांधी की, आपकी आलोचना होगी लेकिन उन्होंने यही  कहा.. ठीक है होने दो… तो ये अलग अलग बातें हैं… जहां तक भोपाल गैस कांड के समय मेरे बयान की बात है तो हादसे के दो दिन बाद मैं अपने घर से भारत भवन गया.. 3-4 किलोमीटर के रास्ते में मुझे हादसे का कोई निशान नहीं दिखा… इतना बड़ा हादसा हुआ लेकिन लोगों ने जीना तो नहीं छोड़ दिया, नित्यकर्म करना तो नहीं छोड़ दिया, लोग बाजार जा रहे थे, अपने काम कर रहे थे… तो इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार एन के सिंह ने मुझे फोन किया कि आपने देखा है भोपाल आज.. बिल्कुल नॉर्मल हो गया… (यही तो दिक्कत है जीवन की.. जीवन आपको ज्यादा देर एबनॉर्मल सिचुएशन में नहीं रहने देता).. मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता.. अंग्रेजी में कहा था.. कि ‘वन डज नॉट डाई विद द डेड’.. अब उसको उन्होंने कुछ इस तरह से छाप दिया कि वो एक कटुक्ति की तरह प्रचलित हो गया…

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मैं अपना रास्ता खुद चुनता हूं – अशोक वाजपेयी

सुधीश पचौरी – जब डिमांड होती है मूवमेंट की तो मंच पर जाकर भाषण दे देते हो, आप एक्टिविस्ट की तरह उतरे मैदान में.. एक्टिविज़्म गायब हो गया और आप भाषण दे रहे हो.. उससे क्या फर्क पड़ता है…लोगग मार दिए जाते हैं.. कलबुर्गी मार दिए गए, पनसारे मार दिए गए.. वो लड़े थे, वो अड़े थे… लेकिन आप सिर्फ ये मुद्रा क्यों अपनाते हैं कि मैं लड़ रहा हूं..

अशोक वाजपेयी –  आप मुझे बताइए कि मैंने कब ये मुद्रा अख्तियार की है कि मैं संघर्ष कर रहा हूं.. मुझसे जो बन पड़ा वो मैंने किया.. मैं एक कवि हूं… मेरा काम है कि जो मुझे समझ में आता है, उसे दूसरों तक पहुंचाऊं.. अगर उससे वो सहमत नहीं है तो ये उनका हक है…मैं उतना ही आगे निकलूंगा जितना मुझे मेरे अधकचरे सयाने विवेक से ठीक लगता है.. मैं अपने मंच चुनूंगा.. न तो मैं वामपंथियों के आंदोलन से जुड़ना चाहता हूं और दक्षिणपंथियों से वैसे भी मेरा कोई ताल्लुक नहीं है.. मैं अपना रास्ता खुद चुनता हूं.. वो गलत हो सकता है…गलत रास्ता चुनने का भी तो मुझे हक है..

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मोदी ऑर्गेनिक फासिस्ट हैं – सुधीश पचौरी

अशोक वाजपेयी – आप एक ज़माने में उत्तर आधुनिकता खंगालने वाले पहले व्यक्ति थे…धीरे धीरे उत्तर आधुनिकता का जो शोर था वो गायब सा हो गया.. ऐसा क्यों हुआ..

सुधीश पचौरी – नहीं.. उत्तर आधुनिकता की दुकान अभी बंद नहीं हुई है … और बड़ी हो गई है… मैं उदाहरण देता हूं… ये जितने भी डिस्कोर्सेज हैं…स्त्रीत्ववादी, दलितवादी, प्रोटेस्टवादी… स्ट्रांग सेंटर के खिलाफ, डिक्टेटरशिप के खिलाफ, फासिज़्म के खिलाफ, अल्ट्रानेशनलिज़्म के खिलाफ, जो भी उपराष्ट्रीयताओं के विरोध हैं वो पोस्टपोन्ड कंडीशन के भीतर ही हैं.. ये एक ऐसी आर्थिक स्थिति है जिसमें पूंजी नहीं है.. पूंजी उद्योग में लगने की जगह सर्विस सेक्टर में लगा दी जाती है. उससे ये तमाम चीजें पैदा हुई हैं.. अगर तमिल अस्मिता चिल्लाती है, कन्नड़ अस्मिता चिल्लाती है और ज़रूरत से ज्यादा भारी भरकम सेंट्रलिज्म के खिलाफ चिल्लाती हैं तो ये उत्तर आधुनिकता का परागम है जो बराबर फंक्शन कर रहा है… साहित्य में जो स्थिति है, पहचान का जो संकट है, वो सारी की सारी इसी कैटेगरी में आती है…तो अब ये व्यावहारिक जीवन में नज़र आ रहा है.. ये जो झगड़े हो रहे हैं बार बार अस्मिता के… वो क्या हैं, ये भोजन को लेकर जो झगड़ा हो रहा है…च्वाइस की बात हो रही है कि ये मेरी व्यक्तिगत च्वाइस है, मैं तो यही खाउंगा…ये है वो रेसिस्टेंस जो पैदा हो रहा है.. और ये है पोस्ट मॉडर्न एलिमेंट…इसीलिए जो अतिराष्ट्रवादी हैं, चाहे वो अमेरिका में ट्रंपवाद हो, भारत में भी कहीं न कहीं ट्रंप है.. यानी ये जो ट्रंपिज़्म है…ये टिकाऊ नहीं होने वाला है… आम जनता चाहती है.. च्वाइस… और तानाशाह कहते हैं.. एक राष्ट्र, एक जीएसटी, एक रूल, एक इकॉनॉमिक्स, एक कल्चर चलाओ.. मैं बड़ा साफ साफ कह रहा हूं.. मोदी के अंदर वो तमाम प्रवृत्तियां हैं जो उन्हें फासिस्ट बना सकती हैं कभी भी… आशीष नंदी ने कहीं लिखा उन्हें ‘किताबी फासिस्ट’.. लेकिन मैं ये नहीं कहूंगा.. वो ‘ऑर्गेनिक फासिस्ट’ हैं…इसमें मैं मोदी जी को नहीं कह रहा हूं.. ये सब आरएसएस के हैं… और आरएसएस में एक टेक्निकल टर्म आता है – ‘एक चालकानो वर्तते’.. यानी एक चलाने वाला… और उनका राष्ट्र कहां है.. ध्वज में… तो.. अगर संघ किसी चीज़ के पीछे है तो वो  ‘एक चालकानो वर्तते’ ही होगा.. अब आप उसे अंग्रेजी में फासिस्ट कह लें, या कुछ और कह लें…अब संकट कहां है.. तो वो खुद बीजेपी के भीतर है… क्राइसिस मासिज़्म है… और मासिज्म क्या है.. जितनी भी योजनाएं हैं, उनको ज़रा गौर से देखिए… एक वक्त कहा गया हमने 500 योजनाएं बनाई हैं, एक बार कहा गया कि हमने हजार से ज्यादा योजनाएं बनाई हैं… और योजनाएं क्या हैं… उनमें से बहुत सी योजनाएं कर्ज की हैं या बीमा की हैं.. या तो कर्ज़ ले लो, या बीमा ले लो.. और बीमा क्या है… यानी पहले तू मर फिर मिलेगा…और ये दोनो मॉडल अमेरिकन मॉडल हैं.. अमेरिका में कोई मध्यमवर्गीय आदमी अपनी तनख्वाह लेकर घर नहीं जाता…वो कट जाता है और वो कर्ज में ही चलता रहता है..तो कुल मिलाकर ये डेथ का एक कॉल है….भला ये कौन सी कल्याणकारी योजना चल रही है… तो इसलिए मैं कह रहा था कि इसे आप हिटलर या मुसोलिनी की तरह का फासिज्म न कहें… इसका तरीका अलग है, रूप अलग है… जब भी इस तरह का फासिज्म आता है.. कलाओं की परीक्षा होती है… जाहिर है कि कलाओं के जो औजार हैं वो आपको कोई युद्ध के मैदान में जाने के लिए नहीं कहेंगी.. ये कोई परीक्षा नहीं होती.. लेकिन ऐसे में कुछ तरकीबें निकलती हैं, पहली तरकीब भाषा के भीतर निकलती है…फासिज्म से लड़ने की…जैसे पिकासो और ब्रेख्त ने नए नए रास्ते निकाले थे… वैसा कोई रास्ता क्यों नहीं निकल सकता… मेरे कहने का अर्थ ये है कि कला और साहित्य का फॉर्मेट हमारा बदलता ही नहीं…भाषा की ही परीक्षा है सारी की सारी…अभिव्यक्ति पर जब इतना अंकुश है तो अभिव्यक्ति को कुशल होना होगा…

अमर उजाला ने इस जुगलबंदी बैठक को एक बेहतरीन पेज के तौर पर छापा है… इसे आप इस लिंक के ज़रिये पढ़ सकते हैं…

http://epaper.amarujala.com/dl/20171001/11.html?format=img

Posted Date:

October 1, 2017

4:11 pm Tags: , , , , , , , , , ,

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