रज़ा और उनके सहयात्री कलाकार

  • रवीन्द्र त्रिपाठी

किसी बड़े कलाकार के अवदान के मूल्यांकन के लिए उसके संपूर्ण कलाकर्म को ध्यान में रखना जरूरी होता है। लेकिन सिर्फ इतने से ही बात नही बनती। ये भी देखना चाहिए कि उसका अपने सहकर्मी कलाकारों से कैसा संबंध रहा। कला एकांत साधना है पर साथ ही सामूहिक कर्म भी है। जब कोई कलाकार- लेखक और संगीतकार भी- किसी दौर में सक्रिय होता हैं तो उसी दौर में उसके कुछ सहयोगी भी सक्रिय रहते हैं जिनसे उसका संवाद भी होता रहता है। इन संवादों की प्रक्रिया में भी किसी कलाकार की सर्जनात्मकता आकार पाती है। उसमें कई तत्व जुड़ते जाते हैं। इस लिहाज से श्रीधरणी कला दीर्घा में इन दिनों चल रही प्रदर्शनी `संग- साथ’ को देखना एक अलग  तरह का कला-अनुभव है।

रज़ा फाउंडेशन की तरफ से आयोजित इस प्रदर्शनी में सैयद हैदर रज़ा के साथ साथ मक़बूल फ़िदा हुसैन,  अकबर पदमसी, कृष्ण खन्ना, राम कुमार और जानीन मौंजिला की कलाकृतियां शामिल हैं। जानीन मौंजिला सैयद हैदर रजा की पत्नी थीं जो फ्रांसीसी थीं। उनका निधन रज़ा के पहले ही हुआ था। फ्रांस में। उनके निधन के बाद ही रज़ा फिर से भारत वापस आए थे। लेकिन जानीन की ज्यादातर कलाकृतियां फ्रांस में ही रह गईं। उनकी कुछेक कलाकृतियां ही भारत मे रज़ा न्यास के पास हैं जिनमें से कुछ यहां प्रदर्शित हैं। जो कलाकृतियां यहां प्रदर्शित हैं उनमें से दो टी-बैग यानी चाय पीने वाले जो छोटे छोटे बैग आते हैं उनको जोड़ने से बनी हैं। इनमें एक अलग तरह की चाक्षुषता है और चाय के स्वाद की स्मृतियां भी आ जाती है। ये दीगर बात है कि इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित और संरक्षित रखना कठिन समस्या है। इसके लिए क्या किया जाता है, ये भी देखने लायक होगा। फिलहाल तो यहां जानीन की कला की झलक तो पाई जा सकती है।

बहरहाल, रजा और उनके सहयोगियों और सहकर्मियों के काम को एक साथ देखना  कुछ प्रीतिकर एहसासों से भर देता है। कला जगत में ये सर्व विदित है कि  रजा और राम कुमार बहुत गहरे दोस्त रहे हैं। रजा और कृष्ण खन्ना भी। इन दोनों के लंबे समय तक पत्र-व्यवहार भी होता रहा जो प्रदर्शनी के पहले दिन ही पुस्तकाकार प्रकाशित भी हुई है। पत्रव्यवहार अंग्रेजी में हुए जो हिंदी अनुवाद में `मेरे प्रिय’ नाम से सामने आया है । इसमें सन् 1956 से लेकर 2000 के बीच दोनों के बीच हुए पत्राचार हैं जिनमें कला से लेकर दोनों के जीवन के सामयिक जीवन की कई चिंताएं शामिल हैं।

 इस प्रदर्शनी में कुछ ऐसी कलाकृतियां भी हैं सुखद विस्मय से भर देती हैं। सब जानते हैं कि रजा अमूर्त कलाकार थे और आजीवन लगभग विंदु ही बनाते रहे। कई तरह से। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब वे आकृतिमूलक कलाकृतियां भी बनाते थे। उनको आज की तारीख में देखना दुर्लभ है। लेकिन इस प्रदर्शनी में रजा की एक आकृतिमूलक कलाकृति भी है जिसमें तीन पुरुष आकृतियां है। एक टेबल है जिसमें रेड वाइन की तीन गिलासे हैं। एक कुर्सी पर एक पुरुष आकृति बैठी है और उसके साथ पर नीचे जमीन पर दूसरी पुरुष आकृति बैठी हुई मुद्रा में है और तीसरा पुरुष खड़ा है; एक खाली कुर्सी भी है। कौन हैं ये लोग? क्या ये रजा की मित्र मंडली है या यों ही रची गई कुछ आकृतियां? सहज जिज्ञासा होती है पर  निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। रजा होते तो वे जरूर बताते। अब तो सिर्फ अनुमान किया जा सकता है। प्रदर्शनी में रजा की कुछ ऐसी भी पेंटिंगे भी शामिल हैं जो अपेक्षाकृत हाल में बनी हैं। कुछेक साल पहले। इन सबको उनके अन्य सहयात्री कलाकारों की कलाकृतियों के साथ देखकर आधुनिक कला इतिहास के कई प्रसंग याद आ जाते हैं।

Posted Date:

July 12, 2019 11:05 pm

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