एलेक पद्मसी का चले जाना…

(वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने जाने माने रंगकर्मी एलेस पद्मसी को उनके जाने के बाद जिस तरह याद किया वह हम सबके लिए अहम है। उन्होंने ये बताया कि किस तरह हमारे तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया ने कला-संस्कृति-रंगमंच-साहित्य-संगीत जैसे विषयों और इनसे जुड़ी खबरों को हाशिए पर धकेल दिया है। यह तमाम मीडिया जगत के लिए शर्म की बात है कि ज्यादातर अखबारों और चैनलों के लिए राजनीति और अपराध या व्यावसायिक हितों के अलावा पत्रकारिता का कोई मायना नहीं रह गया है।  ‘7 रंग’ के पाठकों को के विक्रम राव का ये आलेख पढ़ना चाहिए। हम ये आलेख उनके फेसबुक वॉल से साभार ले रहे हैं।)

 के.विक्रमराव

अपनी आत्मकथा ‘मेरी दुहरी जिंदगी’ में एलेक पद्मसी जी ने बताया था कि दो नावों में पैर रखना कितना लोमहर्षक होता है और आह्लादकारी अनुभव भी| नाट्यशास्त्र के सिरमौर, रंगमंच के सिरताज तथा विज्ञापन मीडिया के पुरोधा एलेक पदमसी का गत शनिवार को मुंबई में नब्बे वर्ष की आयु पर निधन स्वतः पहले पन्ने की खबर थी| मगर भाषायी दैनिकों, विशेषकर हिंदी में, खबर गायब रही या चन्द लाइनों में ही थी| कला से इतना अनजानापन बड़ा घना लगा| भले ही उपेक्षा क्षम्य हो सकती है| इस हस्ती को कम जानने वालों के लिये इतना ही पर्याप्त है कि फिल्म ‘गांधी’ में मोहम्मद अली जिन्ना के रोल में पदमसी थे| आम जन के लिये वे “बुलंद भारत की बुलंद आवाज” का नारा गुंजानेवाले रहे, जो “हमारा बजाज” के विज्ञापन के सृजक थे|


उन्होंने सर्फ की मध्यमवर्गीय गृहणी ललिताजी की किरदारी रची थी| करसनदास पटेल की कमदाम वाली निरमा में स्कर्ट पहने बालिका के मुकाबले ललिताजी “सस्ती चीज नहीं, अच्छी चीज” का दावा पेश करती थी| “सिर्फ सर्फ की खरीददारी में ही समझदारी है” सूत्र उत्तर भारत के घर-घर में गूंजा था| उनका सूत्र लुभाता रहा| गर्भ निरोधक के “कामसूत्र” को पूजा बेदी द्वारा पेश कर आबादी-नियंत्रण में वे सहायक बने| जूता पालिश के लिये चार्ली चैपलिन नुमा चेहरा “चेरी ब्लोसम” के इश्तहार के वे कारगर प्रचारक थे|
लेकिन रंगमंच पर पदमसी छा गए थे| तुगलक की भूमिका में अर्धविक्षिप्त सुल्तान अथवा शेक्सपियर के “मर्चेंट ऑफ़ वेनिस” में बाल कलाकार, दोनों में वे सामान रूप से प्रभावी रहे| हम पत्रकारों के लिये आकर्षक हेडिंग लिखना उनसे सीखा जाता था| पत्रकारिता-प्रशिक्षुओं को पदमसी का उद्बोधन ज्ञानवर्धक होता था| खुद नरेंद्र मोदी ने पदमसीजी को “विलक्षण संप्रेषक” माना| पदमसी सलाह भी युवावों को देते थे: “आलवेज ए चैम्पियन, नेवर ए चैलेंजर |”


एक बार उनकी सहयोगी ने कहा, “ सर, थके लग रहे हैं”| फटाक से उनका जवाब था, “परेशान हूँ, शायद| थका हुआ? कभी नहीं |”
मुंबई में उनका परिवार डेढ़ सदी से बसा था और इस उदारवादी शहर को अपना लिया था| सीमावर्ती कच्छ जिले ( भारत का सबसे बड़ा जनपद) के पदमसी को मुंबई का आज का मजहबी विभाजन अंत तक कचोटता रहा| हिन्दुजन उन्हें मुसलमान मानते रहे| मुसलमान उन्हें खोजा इस्माइली शिया मतावलंबी होने के कारण गैरमुसलमान कहते थे| केवल रंगमंच और विज्ञापन-विधा उन्हें संतुलित बनाये रखने में कारक बने|
व्यंग्य उनका बड़ा सटीक रहता था| एक बार चपरासी ने कहा: “साहब, आपके घर से श्रीमती पदमसी का टेलीफोन है|” जवाब में चपरासी से डांटते हुए पुछा : “ बेवकूफ, कौन पदमसी? तीन हैं: मेरी माँ, मेरी पत्नी या मेरी बेटी?” ऐसे थे असली एलेक पदमसी|

(के विक्रमराव के फेसबुक वॉल से)

Posted Date:

November 20, 2018 4:34 pm

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