क्या आप बनारस के मणिकर्णिका कुंड के बारे में जानते हैं?

(वरिष्ठ पत्रकार सुधीर राघव किसी भी शहर में रहते हैं, वहां के इतिहास को तलाशने की कोशिश ज़रूर करते हैं। आप उनके ब्लॉग sudhirraghav.blogspot.com में उनके कई ऐसे आलेख पढ़ सकते हैं और कई जगहों के बारे में जान समझ सकते हैं। फिलहाल कुछ महीनों से सुधीर राघव काशी नगरी यानी वाराणसी में हैं। घुमक्कड़ी की उनकी आदत है, सो वहां के तमाम दुर्लभ और चर्चित जगहों का इतिहास तलाश रहे हैं। इस आलेख में उन्होंने बनारस के मणिकर्णिका कुंड को करीब से देखा है और इसके पौराणिक -ऐतिहासिक पहलुओं की तलाश की है। उनके ब्लॉग से हम यह साभार ले रहे हैं।)

यह है मणिकर्णिका कुंड। साथ लगे शिलालेख में अंकित है कि इसका निर्माण भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से किया था।

पहले इसका नाम चक्र पुष्पकारिणी कुंड था। भगवान विष्णु ने यहां कई हजार वर्ष भगवान शिव की उपासना की। प्रसन्न होकर शिव ने वरदान दिया कि यह तीर्थ काशी का सर्व प्रधान अनादि तीर्थ होगा। विधि विधान से जो इसमें स्नान करेंगे जीवन की दासता से मुक्त हो जाएंगे।

तदुपरांत भगवान शिव और माता पार्वती ने इस कुंड में स्नान किया। स्नान से प्राप्त आनंद से शिव झूमने लगे और उनके कर्णिका की मणि इस कुंड में गिर गई। इसी से इसका नाम मणिकर्णिका हुआ। अब यह कुंड सूखा है। वर्ष के अधिकांश समय यह सूखा ही रहता है। यह गंभीर चिंता की बात है। धर्म की दृष्टि से भी और पर्यावरण की दृष्टि से भी। धर्म का आधार प्रकृति है।
स्वयं भगवान विष्णु द्वारा निर्मित इस कुंड का सूखना काशी के लिए उत्पन्न हो रहे पर्यावरण संबंधी खतरे का स्पष्ट संकेत है।

बरसात में जब गंगा उफान पर होती है तो भूमिगत जलस्तर भी बढ़ता है। तभी कुछ समय के लिए इस कुंड में पानी दिखता है। इसमें भी बडा़ हिस्सा पक्के घाट से बहकर आए पानी का होता है।काशी में अनेक प्राकृतिक कुंड हैं। पिशाचमोचन कुंड, मातृ कुंड, पितृ कुंड, लोलार्क कुंड आदि। इनमें अधिकांश धार्मिक महत्व रखते हैं। इन पर मेले लगते हैं।

असल में ये कुंड काशी की कई मर गई (लुप्त) नदियों के गवाह (अवशेष) हैं। उनके पेलियोचैनल का संकेत हैं। काशी की पूर्व दिशा मेंं बहती गंगा में पश्चिमोत्तर से आकर कई नदियां गिरती थीं। इनमें अब वरुणा और असि नदी ही बची हैं। इंसानी जरूरतों के दबाव में इन दोनों नदियों को भी धीरे धीरे मारा जा रहा है। ये गंदा नाला भर बनकर रह गयी हैं। समय के साथ गोदाउरी और मंदाकिनी नदियों के लुप्त होने के संकेत मिलते हैं। पर्यावरणविद मानते हैं कि इन पश्चिमोत्तर की ओर बह रही नदियों द्वारा लाई मिट्टी पर ही काशी बसा है। ऐसे में अगर भूमिगत जलस्तर में बडी़ गिरावट हुई तो यह मिट्टी धंसने लगेगी। यह एक गंभीर खतरा है।

मणिकर्णिका कुंड यही संकेत दे रहा है। धर्म के नियम इंसान को सिर्फ सचेत करते हैं। आगे इंसान की मर्जी। सरकार को काशी के भूगर्भीय और पर्यावरण के अध्ययन पर ध्यान देना चाहिए। यही सरकार का कर्तव्य है। पूजा-पाठ का काम जनता पर छोड़ देना चाहिए। मगर हर सरकार वोट की राजनीति से ऊपर कभी सोच ही नहीं पाती।

Posted Date:

February 6, 2019 8:17 pm

Tags: , , , , ,
Copyright 2017- All rights reserved. Managed by iPistis