चिट्ठी ना कोई संदेश, ना जाने कौन से देश…

वह 1977 का साल था। पहली दफा तभी जगजीत सिंह को सुनने का मौका मिला। लाइव नहीं, बल्कि उनके पहले अल्बम – ‘द अनफॉरगेटबल्स’ के दो एलपी रिकॉर्ड्स में। फिलिप्स के नए नए स्टीरियो की धमक के बीच जगजीत सिंह जब अपने अंदाज़ में ‘आहिस्ता आहिस्ता’ गाते तो हम सब उनके साथ साथ खुद भी ‘आहिस्ता आहिस्ता’ बरबस ही गाने को मजबूर हो जाते। वो अंदाज़ ही अलग था और उस दौर के नए नवेले ग़ज़ल गायक के इस अकेले अल्बम ने संगीत की दुनिया में और खासकर ग़ज़लों की दुनिया में हलचल मचा दी थी। वैसे तो इस अल्बम में उनकी एकल (सोलो) गज़ल सिर्फ चार थी लेकिन अपनी हमसफ़र चित्रा सिंह के साथ मिलकर उन्होंने दो गज़लें और गाईं, चित्रा जी की भी 4 सोलो ग़ज़लें इसमें शामिल थी। लेकिन अगर सबसे ज्यादा हिट कोई ग़ज़ल हुई तो वो थी.. ‘सरकती जाए है रुख से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता’ और ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’। ‘ग़म बढ़े आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह’ और ‘दोस्त बन बन कर मुझको मिटाने वाले’ भी लोगों को याद रही। जगजीत सिंह तब से ही ग़ज़लों को एक नया आयाम देने वाले एक हरदिलअज़ीज़ गायक बन गए।

जगजीत सिंह को गुज़रे करीब आठ बरस हो गए। आज अगर होते तो 79 साल के हो रहे होते। लेकिन वक्त के थपेड़ों ने जगजीत सिंह को कई बार तोड़ा, कई बार वो निजी तौर पर बेहद परेशान रहे, लेकिन संगीत उनकी आत्मा थी और उनकी आवाज़ चाहने वालों के लिए एक अद्भुत पूंजी। अपने तमाम शोज़ के दौरान कभी कभार वो अपने अतीत को याद करते, बचपन के संघर्षों की भी बात करते और वो दर्द उनकी ग़ज़लों में उतर आता। अपनी आशिकी के किस्से भी सुनाते और उस रूमानियत को भी अपनी आवाज़ की गहराइयों में ले आते।

भले ही उनकी पैदाइश राजस्थान के गंगानगर की हो, लेकिन पुश्तैनी गांव था पंजाब के रोपड़ जिले का दल्ला गांव। पिता अमर सिंह धीमान सरकारी नौकरी में थे और चाहते थे कि बेटा सरकारी अफसर बने। लेकिन बचपन का जीत (यानी सरदार जगजीत सिंह धीमान) अपनी आवाज़ से कम उम्र में ही स्कूल-कॉलेज में अपने दोस्तों का चहेता बन गया। पिता की आवाज़ भी अच्छी थी, गायिकी का हुनर भी था, जाहिर है उसका असर जीत पर था और बचपन में कुछ उस्तादों की संगत में शास्त्रीय संगीत, ध्रुपद, खयाल और ठुमरी भी सीख ली। पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगा और गायक बनने की धुन सवार हुई। 24 साल की उम्र में मुंबई आए और फिर उस दौर के तमाम मशहूर गायकों मुकेश, किशोर, रफी और मन्ना डे के गीत जगह जगह गाने लगे। शुद्ध शास्त्रीय गायन कोई सुनता नहीं था, तो पेट पालने के लिए तमाम आयोजनों में फिल्मी गीत गाने लगे, लेकिन 1969 में चित्रा सिंह से शादी के बाद ग़ज़लों में नया रास्ता मिल गया।

तब ग़ज़लें आम तौर पर फिल्मों में ही इस्तेमाल होती थीं। ग़ज़लकार तो तमाम थे, लेकिन ग़ज़ल गायिकी का रिवाज़ नहीं था। पाकिस्तान में तो फिर भी ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, फ़रीदा खानम, नूरजहां, नुसरत फ़तेह अली खां जैसे ग़ज़ल गायकों की एक परंपरा थी, लेकिन भारत में बेग़म अख्तर, कुंदनलाल सहगल, तलत महमूद के अलावा लोग ग़ज़ल गायकों के तौर पर किसी को नहीं जानते थे और बेग़म अख्तर को छोड़कर बाकी नाम फिल्मों की वजह से जाने जाते थे। जाहिर है, ऐसे वक्त में ग़ज़ल को आम आदमी से जोड़ने, लोकप्रिय बनाने और ग़ज़ल को नए अंदाज़ में पेश करने वाला कोई नहीं था। जगजीत सिंह को ही इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने ग़ज़ल को आम आदमी से जोड़ा। मीर तक़ी मीर, गालिब, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक गोरखपुरी, वसीम बरेलवी, निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, गुलज़ार, जावेद अख्तर जैसे तमाम शायरों को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी और आम लोगों के बहुत करीब ला दिया। यही वजह है कि आज के दौर में शायरों की एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त आपको मिल जाएगी और बदलते वक्त में शायरों की मांग भी खूब बढ़ गई है। शायरी के मिजाज़ बदले, कहने के तौर तरीके बदले, मंच पर शायरी कहने की तमाम अदाएं विकसित हो गईं और तालियों के शौकीनों के लिए शायरी मानों एक व्यवसाय बन गई। लेकिन बात शायरी कहने में उतनी नहीं जितनी उसे जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनकर दिल में उतार लेने की है।

जाहिर है, जगजीत सिंह अपने जन्मदिन पर हमें और तमाम संगीतप्रेमियों को ग़ज़लप्रेमियों को और बेशक शायरों को भी तहेदिल से याद आते हैं। न सिर्फ जन्मदिन पर बल्कि हमेशा हमेशा.. यानी जब भी ग़ज़लों की बात आती है तो जगजीत सिंह की आवाज़ और गहराई तक उतर जाने वाली वो धुनें ज़रूर याद आती हैं।

Posted Date:

February 8, 2019 3:56 pm

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