मां का बाल विवाह हुआ था और वह बहुत ही कम उम्र में विधवा हो गई थीं: गिरीश कर्नाड

(अमर उजाला ने गिरीश कर्नाड को बेहद सम्मान दिया। उन्हें अपने सर्वोच्च शब्द सम्मान आकाश दीप से सम्मानित किया। उसी दौरान गिरीश कर्नाड ने अपने दिल की बहुत सी बातें अमर उजाला से साझा कीं। इनमें से कुछ को अमर उजाला काव्य ने छापा। वहीं से आभार के साथ हम गिरीश जी की वो बातें आपके साथ साझा कर रहे हैं जिससे उनकी यात्रा के कई पड़ावों के बारे में उन्हीं की जुबानी पता चलता है।)

कर्नाटक कॉलेज में एक चलन था। सब कविताएं, छोटी कहानियां, लोक-कथाएं लिखते थे। मैं भी धीरे-धीरे इस ओर बढ़ने लगा और तब मुझे सबसे ज्यादा जिसने प्रभावित किया, वह थे कीर्तिनाथ कुर्तकोटि। मुझे मनोहर ग्रंथमाला में एंट्री मिली और इसी ने ही मुझे एक लेखक बनाया। 

मैंने सोलह साल की उम्र में अपने परिवार की एक बात जानी थी कि मेरी मां का बाल विवाह हुआ था।  वह बहुत ही कम उम्र में विधवा हो गई थीं।

उस शादी से उनका एक बेटा था, जो मेरे बड़े भाई हैं। उसके बाद उन्होंने पढ़ाई की, नर्स बनीं। उसी दौरान उनकी मुलाकात पिताजी से हुई, फिर उन दोनों ने शादी कर ली। जिसके बाद मैं और मेरी एक छोटी बहन हुई। हम तीनों भाई-बहन एक साथ मिलकर रहे। इस तरह मेरी मां का प्रभाव मुझ पर बहुत ज्यादा रहा, क्योंकि इतने संघर्ष के बाद भी उनके चेहरे पर एक तेज रहता था। मैं जब छोटा था, तब स्केचेज बनाने का बहुत शौकीन था।

मैं जाने-माने लोगों के स्केच बनाता था और फिर स्केचेज को उन्हीं के पास भेजता था, जिनके स्केच होते थे। इस तरह उन लोगों से मैं ऑटोग्राफ मांगा करता था। 

जब मैं 17 साल का था, तब मैंने आइरिस लेखक ‘सीन ओ कैसी’ की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने मुझे एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैं यह सब करके अपना वक्त जाया न करूं, बल्कि कुछ ऐसा करूं, जिससे एक दिन लोग मेरा ऑटोग्राफ मांगे। मैंने पत्र पढ़कर ऐसा करना बंद कर दिया। मेरे माता-पिता दोनों की ही थियेटर में दिलचस्पी थी। मेरे पिता उस समय काम के सिलसिले में घूमते रहते थे। बाल गंधर्व के नाटक हों या मराठी थियेटर, उन दोनों की दिलचस्पी पूरी रहती थी।

 वे अक्सर थियेटर की बातें घर में किया करते थे। थियेटर कितना शानदार होता था, यह मैंने उन्हीं से सुना। मेरे पिता सरकारी सेवा में थे और वह 1942-43 में रिटायर हुए, लेकिन चूंकि उस समय युद्ध जारी था, तो उनकी सर्विस को बढ़ा दिया गया और उनकी पोस्टिंग सिरसी (कर्नाटक) कर दी गई। 

सिरसी में उस समय बिजली नहीं हुआ करती थी और गांव जंगलों के बीच में हुआ करता था। उस समय वहां कुछ नाटक मंडलियां हुआ करती थीं और लोग ‘यक्षगान’ देखा करते थे।सिरसी की एक बात अच्छी थी कि वहां कई सारी कहानियां थीं। मैंने जितना इतिहास या जितने पुराणों के बारे में पढ़ा या जाना, वह सब मुझे सिरसी ने बताया। इस तरह मुझे थियेटर के बारे में भी पता लगा। कुछ समय बाद हम सब धारवाड़ चले गए।

साहित्य में रुचि रखने वाले या सिर्फ धारवाड़ में रहने वाले कहीं जाएं या न जाएं, लेकिन डी.आर. बेंद्रे के भवन जरूर जाते थे। उस समय हमें कोई अपॉइंटमेंट नहीं लेना पड़ता था और बेंद्रे कभी परेशान भी नहीं होते थे। 

हमसे मिलते, बातचीत करते। अपनी कविताएं हमें सुनाते। वहां से निकलने के बाद एकदम तरोताजा महसूस करता था मैं। फिर जब कर्नाटक कॉलेज गया, तो उस समय एक चलन था।

बच्चों का रुझान साहित्य की तरफ बढ़ रहा था। सब कविताएं, छोटी कहानियां, लोककथाएं लिखते। मैं भी धीरे-धीरे इस ओर बढ़ने लगा, लेकिन उस समय मुझे सबसे ज्यादा जिसने प्रभावित किया वह थे कीर्तिनाथ कुर्तकोटि।वे मुझसे बड़े थे। उनके विचारों से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। उन्हीं के जरिए मैं बाद में जी.बी. जोशी से मिला और मुझे मनोहर ग्रंथमाला में एंट्री मिली, जो उस समय बहुत बड़ी बात होती थी और मनोहर ग्रंथमाला ने ही मुझे एक लेखक बनाया।

मैं यहां कीर्ति और जी.बी. जोशी के साथ आता था, तो काफी समय उनके साथ बिताता था। इसके जरिए मुझे अपनी भाषा को और जानने का मौका मिला। धारवाड़ में पढ़ाई पूरी होने के बाद मैं आगे पढ़ने के लिए इंग्लैंड चला गया। 

मुझे कवि बनना था, लेकिन 1951 में सी. राजगोपालाचारी का लिखा महाभारत प्रकाशित हुआ था। उसने मुझे बहुत प्रभावित किया और एक दिन यूं ही कई सारे विचारों से घिर गया। मैं महसूस कर सकता था कि मेरे कानों में महाभारत के संवाद गूंज रहे थे।
मैं बस लिखता गया। लिखता गया और ‘ययाती’ लिखा, जो 1961 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1963 में मैं ऑक्सफॉर्ड यूनियन का प्रेसिडेंट बना था। सात साल ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में काम करने के बाद मैंने इस्तीफा दे दिया और लिखने को ही पूरा समय देने लगा।

मद्रास में थियेटर ग्रुप ‘द मद्रास प्लेयर’ के साथ नाटकों में हिस्सा लेने लगा। फिर कई नाटकों की कहानी लिखने का सफर शुरू हुआ। 

इसी तरह फिल्मों में भी आगे बढ़ता रहा। मैंने 1970 में फिल्म ‘सम्सकारा’ से डेब्यू किया था, जिसकी कहानी यू.आर. अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित थी।

फिल्म को काफी पसंद किया गया और कन्नड़ सिनेमा के लिए मुझे ‘प्रेसिडेंट्स गोल्डन लोटस अवॉर्ड’ भी मिला। इसके बाद 1986-87 में आर.के. नारायण के प्रसिद्ध ‘मालगुडी डेज’ पर आधारित टीवी सीरीज का हिस्सा बना। 

1990 में दूरदर्शन की साइंस मैग्जीन ‘टर्निंग प्वाइंट’ को होस्ट किया। बस इसी तरह अपनी लेखनी के जरिए फिल्मों से भी जुड़ा हुआ हूं।

(अमर उजाला काव्य से साभार)

Posted Date:

June 10, 2019 11:16 am

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