लिखने से पहले पढ़ना बेहद अहम है – विभूति नारायण राय

‘साहित्य की दुनिया न हम से शुरू होती है न हम पर खत्म’

गाजियाबाद। सोशल मीडिया के इस दौर में तमाम नए रचनाकारों की बेहतर अभिव्यक्ति तो ज़रूर नज़र आती है लेकिन वो अपने अलावा दूसरों को कितना पढ़ रहे हैं और सचमुच उनमें पढ़ने के प्रति दिलचस्पी है या नहीं, यह देखना बहुत ज़रूरी है। वरिष्ठ लेखक और उपन्यासकार विभूति नारायण राय ने गाजियाबाद के रचनाकारों के बीच अपनी यह चिंता जाहिर की और कहा कि तकनीकी तौर पर साहित्य की दुनिया भले ही समृद्ध हुई है लेकिन नए लेखकों में पढ़ने के प्रति पहले जैसी ललक अब नहीं दिखती।

कभी इस शहर के पुलिस कप्तान रहे लेकिन अपनी साहित्यिक अभिरुचि की बदौलत एक आईपीएस से अलग पहचान बनाने वाले विभूति जी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके हैं। “मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन” के “कथा संवाद” में विभूति नारायण राय ने कहा कि सवाल यह है कि आज का लेखक पढ़ क्या रहा है? किसे नापसंद कर रहा है? किसी लेखक को खारिज करने की वजह क्या है? उन्होंने कहा कि किस्सागोई की परंपरा को जिंदा रखने के लिए कथा संवाद जैसे आयोजन बड़ी अहमियत रखते हैं।

विभूति जी के मुताबिक साहित्य की दुनिया ना हमसे शुरू होती है ना हम पर खत्म होती है। वरिष्ठ कथाकार से. रा. यात्री के एक कथन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यात्री जी जैसा बड़ा लेखक अक्सर इस बात पर चिंता व्यक्त करता है कि चेखव, शेक्सपियर, रोमा रोला जैसों की जमात में हम क्यों कूद पड़े? उन्होंने कहा कि यात्री पठन-पाठन की एक समृद्ध परंपरा के प्रतिनिधि हैं। विश्व का कोई साहित्य ही उनसे अछूत आ रहा होगा। अगर यात्री जी जैसा दिग्गज लेखक इस क्षेत्र में अपना अस्तित्व तलाश रहा है तो यात्री जी की चिंता उन लोगों के लिए नसीहत है जो इस क्षेत्र की ओर अग्रसर हैं। श्री राय ने कहा कि लिखो या ना लिखो पढ़ना लाजमी है।

कथा संवाद के दौरान पढ़ी गई प्रवीण कुमार की कहानी “सफर अभी बाकी है” और अर्चना शर्मा की कथा “जीवन लेखा” के ड्राफ्ट की चर्चा करते हुए श्री राय ने कहा कि जिस आत्मविश्वास के साथ प्रौढ़ लोगों ने अपनी पहली रचना का पाठ किया है, वह दिग्गजों की मौजूदगी में साहस का काम है। कीर्ति रतन की कहानी ” उफ तौबा”, शिवराज सिंह के कथा ड्राफ्ट “वह कौन था”, सुरेंद्र सिंघल के कथा ड्राफ्ट “लू को हक किसने दिया” और प्रणव भारती के उपन्यास “गवाक्ष” के अंश पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि लेखन की ओर अग्रसर होने वाले और देर से लेखन में हाथ आजमाने वाले इन लोगों के भीतर लेखन की असीम संभावनाएं छुपी हैं।

यहां मौजूद कथाकारों, रचनाकारों और पत्रकारों ने भी अलग अलग तरीके से इन कहानियों और लेखकों के बारे में अपनी राय रखी। उनका कहना था कि ये कहानियां मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से लेकर सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को बखूबी रेखांकित कर रही हैं। चर्चा के दौरान विभूति नारायण राय की कृति “प्रेम की भूत कथा” का भी जिक्र आया और कहा गया कि कोई पात्र खड़ा कैसे होता है इसे जानने के लिए यह उपन्यास पढ़ना चाहिए। चर्चा में डॉ. धनंजय सिंह, सुभाष अखिल, सुभाष चंदर, डॉ. बीना शर्मा, डॉ. संजय शर्मा, सीमा सिंह, नित्यानंद तुषार, डॉ. राजीव पांडे, तारा गुप्ता, तेजवीर सिंह, सुशील शर्मा, कुलदीप, अशोक दुआ, आर. के. भदौरिया, भारत भूषण बरारा, अतुल सिन्हा सहित कई अन्य लोगों ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन आलोक यात्री ने किया।

 

Posted Date:

September 10, 2018 4:20 pm

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