सौ साल के त्रिलोचन…

त्रिलोचन जी को याद करना एक पूरे युग को याद करने जैसा है। उनका विशाल रचना संसार और बेहद सरल व्यक्तित्व अब आपको कहीं नहीं मिलेगा। उनकी कविताओं को, उनकी रचना यात्रा को और उनके साथ बिताए गए कुछ बेहतरीन पलों को साझा करना शायद बहुत से लोग चाहें, लेकिन बदलते दौर में, नए सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में और साहित्यिक जमात की खेमेबाजी में त्रिलोचन आज भी हाशिए पर हैं। उनकी जन्म शताब्दि की औपचारिकताएं तो थोड़ी बहुत जरूर हुईं लेकिन ठीक जन्मदिन वाले दिन उन्हें भुला दिया गया। त्रिलोचन जी के बेटे और वरिष्ठ पत्रकार अमित प्रकाश सिंह ने  त्रिलोचन जी को उनके सौ साल पूरे होने पर किस तरह याद किया, ‘7 रंग ‘के पाठको के लिए ये पढ़ना एक अनुभव की तरह होगा।

कौन हैं कवि त्रिलोचन 

आज वे नहीं हैं। पर कविताएं हैं उनका लिखा लोगों के घरों में है। उनके कविता संग्रह अब दिखते नहीं। उनका रचना समग्र शायद कभी कहीं कोई छापने की हिम्मत करे।
कहते हैं वह चलती फिरती यूनिवर्सिटी था। बडी हिम्मत से हिंदी के एक अध्यापक ने कहा था ।वह अंग्रेजी लेखक टामस हार्डी की तरह अपने लेखन में अपने गांव में ही केंद्रित हो जाता था। यह कहने वाले भी हिंदी के अध्यापक थे। फिर किसी ने कहा हिंदी में रचनाकारों को ऊंचा और नीचा बताने की प्रवृत्ति आलोचकों में आ गई है। यानी बिना पढे बिना समझे और बिना लिखे शिगूफा छोडते रहो। यह कहते रहो कि मुक्तिबोध महान थे या त्रिलोचन।
हमारा यह हिंदी साहित्य है। जहां भक्तियुगी साहित्य का नया सौंदर्य शास्त्र का आधार शरीर के छिद्र है। यह सब करने और लिखने वालों को यह नहीं पता कि इंसान जब श्रम करता है और उसकी भौंहों पर पसीने की बूंदे चूचुहाने लगती हैं तो वह अपनी आंखों इंद्रधनुष देखता है।यह उसका अपना इंद्रधनुष होता है। ऐसा था त्रिलोचन जो यह लिख सका ।
मुझसे भोपाल में एक आलोचक ने पान चबाते हुए भारत भवन में कहा कि वे कविता संग्रह के संपादक हैं। वे कवियों को मंच दे रहे हैं । लेकिन यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है कि वे यह पता लगाएं कि किस कवि के वंशज कहां हैं और उन्हे कविता के प्रकाशन पर कोई राशि दिलाएं।
अरे तो आप उस कवि को बख्श दो। मत शामिल करो अपने संग्रह में। लेकिन नहीं। एक आलोचक ने कहा कि आपके पिता का जब निधन हुआ तो मैंने अपने प्रापर्टी डीलर बेटे को उनकी तेरही में आपके गांव भेजा। मैंने चालीस साल पहले एक संग्रह निकाला । उसमें नागार्जुन त्रिलोचन आदि थे । अब आप क्यों त्रिलोचन का लेने पर क्यों विरोध कर रहे हैं । मैं दूसरी जगह से छपवा लूंगा आप क्या कर लेंगे। मैनें उनसे यही कहा था कि आप प्रकाशन की अनुमति लेखक या उसके वंशजों से ले लीजिए । अपने गांव में खेतों की मेड पर फौजदारी करने वाले आलोचक ने कापीराइट कानून ताखे पर रखा और अपने मन की कर ली।


एक कवि आलोचक ने तो त्रिलोचन के ही अपने द्वारा संपादित पुराने संग्रह को फिर छपवाया वह भी बिना अनुमति के। प्रकाशक की आंखें उन दिनों तकलीफ में थीं। चश्मा नहीं आया था ।एक कवि व बाबू संपादक ने कवि त्रिलोचन की अवधी कविताओं पर अपने सांस्कृतिक साहित्यिक प्रकाशन केंद्र में किताबें बेचने का काम करने वाले से कविताओं पर राय लेने में पांच महीने लगा दिए।
ऐसा ही बहुतों ने किया और कर रहे हैं। आप यदि कवि के वंशज हैं तो आहें भरते रहिए।
अब उन लोगों की सुनिए जो त्रिलोचन की डायरी लेखों और कविताओं को अपनी झूठ बोलने की कला के जरिए दबाए बैठे हैं। ऐसे बहुत हैं जिनके साथ समय कभी न्याय करेगा।
अभी त्रिलोचन पर एक किताब उनके बडे पुत्र ने लिखी है। यह किताब यदि अड़तालीस साल पहले वे लिखते तो शायद कुछ तथ्यात्मक रही होती। अपनी कल्पना के आधार पर लिखना और संदर्भ ग्रंथ गिनाना साहित्य की खास विशेषता है। क्योंकि कोई चेक नहीं करता। अब उप्र के सुल्तानपुर जिले के गांव कटघरापट्टी में न त्रिलोचन है न उनके वंशज।
इसलिए न तो इस पर शोध करने वालों की कोई इज्जत कहीं है और न भरोसा।
फिर भी अपनी भाषा से उम्मीद रखनी चाहिए। इस साल हैदराबाद वाराणसी और दिल्ली में त्रिलोचन को जानने वालों ने उन्हें याद किया। यह कम नहीं।

उनकी कविता का एक अंश:

अबतक जो होता आया है
उसमें जन सम्मान नहीं है
उसमें मानव को मानव के
सुख-दुख का कुछ ध्यान नहीं है
उससे व्यक्तिवाद पनपा है
उससे पूंजीवाद हुआ है
इन्हें नष्ट कर शोषित मानव
शाप काट दो जगजीवन का ।

त्रिलोचन आज नहीं हैं। पर उनकी कविताएं डायरी लेख कभी प्रकाशित हों और पुस्तकालय में नही, घरों में रखे जा सकें इस कामना के साथ
मैं पुत्र अमित प्रकाश

(अमित प्रकाश सिंह के फेसबुक वॉल से साभार)

Posted Date:

August 20, 2018 4:09 pm

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