उत्तराखंड में खुला कला का नया केन्द्र ‘उत्तरा’ – सुरेन्द्र जोशी की परिकल्पना साकार

सच हुआ कलाकार सुरेन्द्र पाल जोशी का सपना

किसी प्राकृतिक आपदा और ऐसी किसी त्रासदी को एक कलाकार किस तरह देखता है और उसे अपनी कला के ज़रिये कैसे आम लोगों के सामने अभिव्यक्त करता है, इसे समझना है तो देहरादून में बनाए गए उत्तरा समकालीन आधुनिक कला संग्रहालय आइए। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस अनोखे कला संग्रहालय और गैलरी को 4 अक्तूबर को कला प्रेमियों और आम जनता को समर्पित किया। इस गैलरी और संग्रहालय की परिकल्पना जाने माने कलाकार सुरेन्द्र पाल जोशी की है और सुरेन्द्र ने इसके लिए करीब डेढ़ साल तक मेहनत की है।

मुख्यमंत्री रावत ने इस संग्रहालय को उत्तराखंड की जनता के लिए एक तोहफा बताते हुए सुरेन्द्र पाल जोशी की कला और उनकी कला यात्रा की तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह दुनिया का ऐसा पहला कला संग्रहालय है जिसकी परिकल्पना केदारनाथ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को केन्द्र में रख कर की गई है। इस गैलरी के बन जाने से अब उत्तराखंड के कलाकार अपनी कला को प्रदर्शित करने का एक बड़ा और व्यापक प्लेटफॉर्म पा सकेंगे साथ ही उत्तराखंड कला के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल कर पाएगा।

उत्तरा के संग्रहालय में सुरेन्द्र पाल जोशी की 50 कलाकृतियां, रेखांकन, शिल्प, इंस्टॉलेशन, फोटो औऱ वीडियो का अद्भुत और स्थायी संग्रह है। 2013 में केदारनाथ और गंगोत्री के तमाम इलाकों में हुई भयानक तबाही और उस प्राकृतिक आपदा की विभीषिका को सुरेन्द्र पाल जोशी ने बेहद करीब से देखा, महसूस किया और फिर उनकी कला में यह त्रासदी कई रूपों में नज़र आई। तभी उनके मन में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ऐसे एक संग्रहालय और कला दीर्घा बनाने का ख्याल आया। उन्होंने इसकी पूरी परिकल्पना को तत्कालीन सरकार के साथ साझा किया और मंजूरी मिलने के बाद इसपर काम शुरू हुआ। दुनिया के तमाम देशों में अपनी कला और नए प्रयोगों की वजह से खास पहचान बना चुके सुरेन्द्र पाल जोशी ने 7 रंग को बताया कि इस संग्रहालय के बन जाने से उनका एक बड़ा सपना पूरा हुआ है। उनका दावा है कि दुनिया में इस तरह का अद्भुत कला केंद्र कहीं नहीं है। सुरेन्द्र बताते हैं कि उत्तराखंड की एक लंबी और समृद्ध कला परंपरा रही है जिसे मध्यकाल में मोलाराम तोमर और उनके पूर्वजों ने एक नया आयाम दिया और गढ़वाल शैली को विकसित किया। लेकिन अब यह शैली और यहां की कला परंपरा धूमिल हो गई है। उन्हें भरोसा है कि इस पहल के बाद एक बार फिर उत्तराखंड की कला को नया मुकाम हासिल होगा और नए कलाकारों को मौका मिलेगा।

Posted Date:

October 4, 2017 11:31 pm

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