दुनिया एक रंगमंच है और हमसब इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं। किसी ने ये पंक्तियां यूं ही नहीं कह दीं। अगर आप गहराई से देखें तो हम सब कहीं न कहीं ज़िन्दगी में हर रोज़ कोई न कोई किरदार होते हैं और हर पल हमारे हाव भाव, बोलचाल का अंदाज़ और तमाम घटनाक्रमों के बीच हमारी भूमिका एक नई कहानी गढ़ती है। भारतीय रंगमंच की परंपरा बेहद समृद्ध है और ये कहीं न कहीं हमारे जीवन के तमाम पहलुओं को स्वांग के ज़रिये सामने लाती है। फिल्मों और टेलीविज़न के आने के बाद से रंगमंच की दुनिया में हलचल मच गई और इसके अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने लगे। लेकिन हर दौर में देश के तमाम हिस्सों में रंगमंच उसी शिद्दत के साथ मौजूद है और रहेगा। इसकी अपनी दुनिया है और अपने दर्शक हैं। यहां भी नए नए प्रयोग होते रहते हैं और देश भर में लगातार नाटकों का मंचन होता रहता है। कहां क्या हो रहा है, रंगमंच आज किस दौर में है, कौन कौन से प्रयोग हो रहे हैं, कलाकारों की स्थिति क्या है, पारंपरिक और लोक रंगमंच आज कहां खड़ा है – ऐसी तमाम जानकारियां इस खंड में।


तकनीकी बमबारी के बीच रंगमंच को बचाने का सही वक्त – वामन केन्द्रे
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February 27, 2018

रंगकर्म संस्कृति का वो अहम हिस्सा है जो किसी न किसी रूप में आम आदमी से जुड़ता है - दिल्ली समेत देश के 17 शहरों में आयोजित हो रहे थिएटर ओलम्पिक की मूल आत्मा यही है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक और थिएटर ओलंपिक को पहली बार अपने देश में करवाने वाले मशहूर रंगकर्मी वामन केन्द्रे इसे एक ऐसी ही उपलब्धि मानते हैं। उनका कहना है कि थिएटर को मौजूदा वक्त में आम लोगों से जोड़ने, उसे एक नई ताक

थिएटर ओलम्पिक की भव्य शुरुआत
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February 17, 2018

शशि कपूर का सबसे बड़ा शाहकार -मुंबई का पृथ्वी थिएटर
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December 5, 2017

पृथ्वी थियेटर ,मुंबई महानगर के उपनगर , जुहू में एक ऐसा मुकाम है जहां बहुत सारे लोगों ने अपने सपनों को रंग दिया है .यह थियेटर अपने पिता स्व पृथ्वीराज कपूर की याद में शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कपूर से बनवाया था. शशि कपूर अपने परिवार में एक अलग तरह के इंसान थे .उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उनके गैरफिल्मी काम की याद आ गयी जो दुनिया भर में नाटक की राजधानी के रूप में जाना जाता है .

प्रेमचंद के गांव में होने के मायने…
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October 12, 2017

प्रेमचंद का गाँव यानि वाराणसी ज़िले (उप्र०) का लमही गाँव! 8 अक्टूबर की सांझ हम प्रेमचंद के गाँव में थे। हम यानि रंगलीला 'कथावाचन’ की रंगमंडली। यह मुंशी प्रेमचंद की 81वीं पुण्यतिथि का दिन था। मई माह में जिस दिन 'कथावाचन' के तहत मैंने प्रेमचंद की कहानियों की प्रस्तुतियों का निर्णय लिया था तब कल्पना भी नहीं की थी कि किसी दिन इन प्रस्तुतियों को लेकर 'कथा सम्राट' की उस धरती तक भी जाना होगा जहा

इनकी चादर मैली नहीं होगी !
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October 12, 2017

सेम्युअल जॉन की इस रंगयात्रा में चादर एक आसमान की तरह उनके साथ रहा है। बिछ गई तो बैठने की जगह बन गई, तन गई तो मंच बन गई, फैल गई तो आने वाले कल के लिए उम्मीद बन गई। लेकिन पटियाला से रंगमंच में ग्रेजुएट जॉन के लिए जब मुंबई से बार-बाक संदेशा आता हो..तो फिर वह संगरूर इलाके के ठेठ गांवों में क्या कर रहे हैं? शायद पिछले 15 सालों में सेम्युअल ने कई बार ऐसे सवालों के जवाब दिए हैं।

प्रेमचंद के गांव में ‘रंगलीला’ का ‘कथावाचन’
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October 6, 2017

आगरा की नाट्य संस्था 'रंगलीला' इस बार प्रेमचंद की पुण्यतिथि (8 अक्टूबर, ) के अवसर पर उनकी जन्मस्थली लमही (ज़िला वाराणसी) में अपने चर्चित कार्यक्रम 'कथावाचन में उनकी 3 कहानियों ('ईदगाह', 'पूस की रात', और 'ठाकुर का कुआं') की प्रस्तुति अपराह्न 4 बजे देगी। बनारस की संस्था 'सुबह-ए- बनारस' ने इसका आयोजन किया है।

इतने रंग एक साथ – ‘नाद रंग’ पढ़िए
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October 4, 2017

आज के दौर में अगर लघु पत्रिका और खासकर इस विषय पर केन्द्रित एक पत्रिका को निकालने की हिम्मत जुटाना आसान काम नहीं। लेकिन युवा पत्रकार आलोक पराड़कर की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपने इस जज़्बे को बरकरार रखते हुए ‘नाद रंग’ निकालने का साहस किया। व्यावसायिकता और बाज़ारीकरण के इस दौर में पत्रिका निकाल पाना और उसे चला पाना कठिन चुनौती है और खासकर तब भी जब ‘डिजिटल युग’ और ‘मोबाइलीकरण’ न

अलविदा टॉम ऑल्टर…
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September 30, 2017

अपनी अभिनय प्रतिभा से हिन्दी फिल्मों में नया मुकाम हासिल करने वाले भारत में जन्में पहले अमेरिकी अदाकार टॉम ऑल्टर नहीं रहे। मुंबई में 29 अक्टूबर की रात उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। रंगमंच और फिल्मों के अलावा तमाम टीवी धारावाहिकों में अपने बेहतरीन अभिनय का लोहा मनवा चुके टॉम ऑल्टर 1950 में मसूरी में जन्में, पढ़ने के लिए अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी गए और 1970 में जब लौटकर आए तो दो साल

‘फेस्टिवल करने या फीते काटने से कला संस्कृति का विकास नही होता’
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September 24, 2017

साहित्य कला परिषद के आगामी नाट्य समारोहों के लिए कलाकारों से जो प्रविष्ठियां मांगी गई हैं, उनकी शर्तें अगर पढ़िए तो साफ लगेगा कि अब सरकार कंटेंट अपने मतलब का चाहती है, स्क्रिप्ट वैसा ही चाहिए जो सरकार की नीतियों की तारीफ करे। इसके खिलाफ दिल्ली के युवा रंगकर्मियों में असंतोष है। मशहूर रंगकर्मी, निर्देशक और जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर नाटक करने वाली संस्था अस्मिता के संस्थापक

प्रेम और आसक्तियों के बीच फंसा ‘कंस’   
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August 5, 2017

गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, तथास्तु एवं प्रिज्म थियेटर ने दिल्ली के श्रीराम सेंटर में महाभारत की महागाथा के नायकों में एक महाराज कंस की मानवीय संवेदनाओं पर आधारित नाटक कंसा का सफल मंचन किया। मंच पर महाराज कंस की भूमिका में जाने-माने कलाकार महेंद्र मेवाती ने अपने अभिनय और संवाद अदायगी से सभागार में उपस्थित दर्शकों को स्तब्ध कर दिया।

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