दिल का खिलौना हाय टूट गया…

 बहुत याद आते हैं उस्ताद बिस्मिल्ला खां 

पटना में दशहरे के वो उत्सव, कई कई रातों के शानदार संगीत कार्यक्रम, बेहतरीन कलाकारों को सुनने और उनके संगीत में खो जाने का वो आनंद… वक्त ने उस सुनहरे इतिहास को कहीं दफ़्न कर दिया है। बचपन में जब पहली बार उस्ताद बिस्मिल्ला खां को सुना तो लगा कि शहनाई वाकई क्या चीज़ है, कितनी दमदार भी है, कितनी कोमल भी है और कितनी मधुर भी है। शायद 1974 या 75 की बात है। तब न तो बड़े ऑडिटोरियम थे, न कलाकारों के वो नख़रे। दुर्गापूजा के तमाम पंडालों में संगीत न हो तो वो बेकार माने जाते थे। पटना में 3-4 ऐसे पंडाल होते थे जहां बिस्मिल्ला खां से लेकर वायलिन की बेहतरीन कलाकार एन राजम और वीजी जोग तक और पंडित जसराज से लेकर गिरिजा देवी तक अपना संगीत सुनाकर लोगों को अभिभूत करने को अपना गौरव मानते थे। बांसुरी हो, सितार हो, शहनाई हो, तबला हो या फिर शास्त्रीय गायन की तमाम शैलियों के जाने माने फ़नकार… संगीत प्रेमियों को इन दिनों का बेसब्री से इंतज़ार रहता था।

गुज़रते वक्त ने संगीत के उन ऐतिहासिक समारोहों को तो खत्म कर ही दिया, अपने जाने माने कलाकारों को भी आम लोगों से दूर कर दिया। एक बार उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने पटना के संगीत प्रेमियों से कहा था कि यहां आकर लगता है कि वाकई संगीत के कद्रदान बाकी हैं। रात रात भर हमारा संगीत सुनने के लिए लगातार बैठना और राग भैरवी सुनने के लिए एकदम सुबह होने का इंतज़ार। वाकई यहां आकर दिल को जो सूकून मिलता है, वह कम ही जगहों पर मिलता है। बिहार के ही डुमरांव में जन्में बिस्मिल्ला खां के लिए पटना से लगाव होना शायद इसलिए भी लाज़िमी था कि वहां से वो अपना बचपन का रिश्ता जोड़ लेते थे और फिर जो उनकी शहनाई कमाल दिखाती थी कि सुनने वाले घंटों उसमें डूब जाते थे।

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को गुज़रे आज 12 साल हो गए, लेकिन न तो शहनाई का कोई और उम्दा कलाकार उभर कर सामने आ सका और न ही शहनाई का वो रुआब अब बाकी रह गया। शादी-ब्याह के दौरान, तमाम शुभ अवसरों पर शहनाई का बजना एक परंपरागत और बेहद संजीदा माहौल पैदा करता था। बिस्मिल्ला खां तब भी सबके आदर्श थे और तमाम पेशेवर शहनाईवादक उनकी ही धुनें बजाने को अपनी शान समझते थे। खासकर फिल्म गूंज उठी शहनाई के उस गीत की धुन जिसके लिए खुद खां साहब ने शहनाई बजाई थी – ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’। या फिर – ‘तेरे सुर और मेरे गीत’।

तमाम कार्यक्रमों में जब बिस्मिल्ला खां शहनाई बजाते थे तो सुनने वाले उनसे इस धुन की मांग ज़रूर करते थे। दरअसल बिस्मिल्ला खां ने जिस इकलौती फिल्म में शहनाई बजाई वो यही थी – ‘गूंज उठी शहनाई’। खां साहब वैसे तो फिल्मों से हमेशा दूर रहे और शहनाई को भी उससे दूर ही रखा, लेकिन जब ‘बैजू बावरा’ जैसी शानदार संगीतमय फिल्म बनाने वाले और तानसेन और बैजू को परदे पर उतारने वाले विजय भट्ट उनके पास ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए आए तो वो मान गए। पूरी फिल्म में खां साहब की शहनाई की धुनें आप सुन सकते हैं। ये धुनें इतनी मशहूर हुईं कि एक बार खां साहब ने खुद कहा कि ‘जहां जाता हूं मुझसे लोग वही धुनें सुनाने को कहते हैं, लेकिन इससे दूसरी धुनों और शास्त्रीय रागों की अहमियत कम नहीं हो जाती।’ फिल्म तो पचास के दशक के अंत में आई थी लेकिन बिस्मिल्ला खां ज़िंदगी के आखिरी लम्हे तक उसकी धुनें बजाते रहे।

बनारस में बेशक खां साहब ने अपना पूरा जीवन काट दिया हो, 66 लोगों के भरे पूरे परिवार के साथ उन्होंने ज़िंदगी के कई खुशनुमा पल बिताए हों, परदादा, दादा औऱ पिता से शहनाई बजाने का हुनर विरासत में पाया हो, लेकिन उनके असली गुरू बने उनके मामा अली बख़्श ‘विलायती’। 6 साल की उम्र में वो बनारस आए तो फिर वहीं के होकर रह गए। मामू जान विश्वनाथ मंदिर में रोज सुबह शहनाई बजाते थे और वही परंपरा उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने आखिरी दम तक निभाई। सरकार ने उनके हुनर की कद्र भी की, सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा, देश विदेश में खां साहब शहनाई के पर्याय बन गए और इस वाद्य को दुनिया भर में पहचान दिलाई। लेकिन आज उनका बनारस उन्हें बस तस्वीर पर चंद फूलों की श्रद्धांजलि देने की औपचारिकता भर निभा पाया। शहनाई आज कहां है, शहनाई को नई पीढ़ी कितना अपना रही है, कितना सीख रही है औऱ तकनीकी बदलाव के इस दौर में क्या शहनाई भी इलेक्ट्रोनिक हो गई है, या इलेक्ट्रोनिक की-बोर्ड का हिस्सा बन कर रह गई है, यह जानने समझने की फुर्सत भला किसको है।

♦ अतुल सिन्हा

Posted Date:

August 21, 2018 10:15 am

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