इस हवेली की दर-ओ-दीवार के रंग को पहचानिए…

ज़िंदगी के महज 28 सालों में कोई कितना कुछ कर सकता है, कितनी उपलब्धियां हासिल कर सकता है और कौन सा मुकाम हासिल कर सकता है… यह जानना है तो महान पेंटर और भारतीय कला को एक नया आयाम देकर अमर हो जाने वाली अमृता शेर गिल को याद कीजिए। भारतीय कला की जब भी बात होती है, राजा रवि वर्मा को तो सब याद करते ही हैं लेकिन आधुनिक भारतीय कला की जनक के तौर पर अगर किसी का नाम लिया जाता है तो वह अमृता शेरगिल हैं। बेशक अमृता हंगरी में जन्मी हों लेकिन भारत में उनकी जड़ें कितनी गहरी रहीं, कहां कहां उन्होंने अपने रंगों की भाषा में इबारतें लिखीं और कौन सी वो हवेली है जहां अमृता ने कुछ साल गुज़ारे, अपनी बेहतरीन पेंटिंग्स बनाई… इसकी तलाश की कलाकार और पत्रकार देव प्रकाश चौधरी ने। अमृता शेर गिल की उस हवेली में देव प्रकाश चौधरी के साथ हम भी चलते हैं और उस सुनहरे अतीत को फिर से तलाशने की कोशिश करते हैं।

 

                                                                 मिट्टी को आज भी याद हैं वे रंग…


सूखी पत्तियों के ढेर में ढका हुआ एक ऐसा रास्ता, जिस पर कदमों के निशान नहीं दिखते। बिकने से बची रह गयी एक पुरानी, लेकिन कभी आलीशान रही हवेली। हवेली के बरामदे में रखवाली कर रहे परिवारों के बुझे-बिखरे चूल्हे और किसी बूढ़े की धुंधलाती याद में बची रह गई थोड़ी सी स्मृति।


गोरखपुर से लगभग 28 किलोमीटर दूर छोटा सा गांव सरैय्या, जिसे अब सरदारनगर भी कहते हैं, में शायद उस आलीशान मजीठिया हवेली की टूटी हुई सीढ़ियों और दीवार के गिरते पलस्तर को देखकर कोई यह पूछने वाला भी नहीं कि किसके लिए बनी थी हवेली। लेकिन हर सूर्योदय में आलीशान अतीत को याद करती और हर सूर्यास्त में खो सी जाती उस हवेली की कई कहानियां हैं, कई रंग हैं। वहां किसी को नहीं मालूम कि 2006 में नई दिल्ली में एक नीलामी में ‘द विलेज ग्रुप’ नाम की एक पेंटिंग पर छह करोड़ नब्बे लाख की जो बोली लगी थी, वह पेंटिंग उसी हवेली में 1938 में बनाई गई थी और उस चित्रकार का नाम था अमृता शेरगिल।
हां, किसी बड़े-बूढ़े से पूछिए। थोड़ी सी बची रह गई स्मृति को टटोलते हुए वे बताएंगे-”आजादी से ठीक पहले उस हवेली में महान चित्रकार अमृता शेरगिल ने अपने पति के साथ कुछ साल बिताए थे और दर्जनों महान कलाकृतियों की रचना की थी।” वैसे तो अमृता का जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में 30 जनवरी, 1913 में हुआ था। पिता उमराव सिंह शेरगिल अभिजात्य परिवार से थे। मां मैरी एंतोनिते ओपेरा सिंगर थीं।
कला का संस्कार विरासत में मिला, लेकिन अमृता सुरों से नहीं बंधी, रंगों से रिश्ता बनाया। वहीं पेशे से डॉक्टर विक्टर एगेन से 1939 में अमृता ने शादी की, लेकिन तब तक देश के राजनीतिक हालात बदल चुके थे और अमृता को अपने परिवार के साथ हिंदुस्तान आना पड़ा।

गोरखपुर में होटल इंडस्ट्री से जुड़े पी.के. लाहिड़ी अपनी स्मृति को खंगालते हुए बताते हैं-” उन्हीं दिनों उनके चाचा सुंदर सिंह मजीठिया ने सरैय्या में देश की सबसे बड़ी चीनी मिल की स्थापना की थी और मजीठिया हवेली का निर्माण कराया था।
सरैय्या की आबोहवा अमृता को इतनी पसंद आई कि वह अपने पति के साथ उस हवेली में रहने आ गईं। विक्टर वहीं प्रैक्टिस करने लगे। बाद में उस परिवार ने एक डिस्टिलरी फैक्ट्री की भी स्थापना की।” तब पी.के. लाहिड़ी बहुत छोटे थे और उन्हें एक बार हवेली में जाने का मौका मिला था-” दीवारों पर पेंटिंग्स टंगी तो देखी थीं, लेकिन तब कुछ समझ में नहीं आया था। हां, एक बात इलाके में जरूर चर्चा में थी कि हवेली में एक खूबसूरत महिला है, जो घुड़सवारी करती है। आस-पास रहने वाली औरतों से खूब बतियाती है और रंगों से न जाने क्या-क्या बनाती रहती है।”

 

खुद को कैनवास पर उतारने में माहिर थीं अमृता शेर गिल – उनके कुछ सेल्फ पोर्टरेट्स

यह बात सच है कि अमृता बुडापेस्ट के रंगीन माहौल में भी उतनी ही सहज ढंग से जी सकती थीं, जैसे कि सरैय्या के शांत वातावरण में। गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार और अमृता शेरगिल के कामों में रुचि रखने वाले मनोज सिंह कहते हैं, ”आपने शेरगिल की कला देखी हो और सरैय्या कभी जाना हो तो आप अमृता के साथ चलने का लोभ संवार नहीं पाएंगे। उस रास्ते पर, जहां वह खुद की तलाश में धूल में, धूप में, कस्बे की धुंधआती बस्तियों की तरफ निकली होगी। वह बाद में बहुत चुप रहने लगी, लेकिन रंग में उनका स्वर सुनाई देता था।”
सरैय्या में रहते हुए उन्होंने जिन चित्रों की रचना की, उनमें व्यू फ्रॉम मजीठिया हाउस (1934), द लिटल अनटचेबल (1936), रेड क्ले एलीफेंट (1938), ऐन्श न्ट स्टोरी टेलर (1940), रेस्टिंग और इन द लेडिज इनक्लोजर (1940) ने दुनिया भर के कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। बाद में वह लाहौर चली गईं। शायद एक किस्म के अकेलेपन की चाह थी, लेकिन जिस रास्ते को चुना उसे भी वह पार नहीं कर पाईं। मात्र 28 साल की उम्र मिली उन्हें, लेकिन ख्याति की कोई सीमा नहीं रह पाई।
फिर भी हम आज उनको याद करते हुए उन कुछ सालों को अक्सर भुला बैठते हैं, जो उन्होंने सरैय्या में गुजारे। आज गोरखपुर को गुरु गोरखनाथ, फिराक गोरखपुरी, गीताप्रेस और चौरी-चौरा कांड से जोड़कर देखने के आदी हो चुके लोगों को याद भी नहीं आता कि कभी एक महान चित्रकार वहां रहती थी।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में उनके नाम की एक कला गैलरी जरूर बनी है, लेकिन गोरखपुर को उन्हें याद करने की वजह भी नहीं मिलती। तब भी, जब दुनिया भर में उनकी जन्म शताब्दी पर अनेक आयोजन हुए। पर, कोई उन्हें याद करे या न करे, सरैय्या में धरती और आकाश को आज भी याद होंगे वे रंग, जो अमृता शेरगिल के कैनवास पर खिले थे।

देव प्रकाश चौधरी

Posted Date:

October 14, 2017 4:58 pm

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