प्रेमचंद के गांव में होने के मायने…

जाने माने रंगकर्मी, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल की कलम से….

प्रेमचंद का गाँव यानि वाराणसी ज़िले (उप्र०) का लमही गाँव!
बीते इतवार (8 अक्टूबर) की सांझ हम प्रेमचंद के गाँव में थे। हम यानि रंगलीला ‘कथावाचन’ की रंगमंडली। यह मुंशी प्रेमचंद की 81वीं पुण्यतिथि का दिन था। मई माह में जिस दिन ‘कथावाचन’ के तहत मैंने प्रेमचंद की कहानियों की प्रस्तुतियों का निर्णय लिया था तब कल्पना भी नहीं की थी कि किसी दिन इन प्रस्तुतियों को लेकर ‘कथा सम्राट’ की उस धरती तक भी जाना होगा जहां उनका जन्म हुआ और जहां रहकर उन्होंने कलम पकड़ना सीखा।

एक निर्देशक के तौर पर मैं तो बेतरह ‘एक्साइटेड’ था ही, मेरी अभिनेत्रियां और अभिनेता भी कम उत्तेजित नहीं थे। वाराणसी से लमही रास्ते में मैंने सोनम से पूछा- “अपने लेखक के गांव जाते हुए उसकी कथा नायिका को कैसा लग रहा है?” अपने बाएं होठ को थोड़ा सा नीचे खींच कर वह मुस्करायी। कुछ देर सोचती रही, फिर बोली- “अभिनेत्री से ज़्यादा मेरे लिए यह महत्व की बात है कि जिस लेखक की कहानियों को मैं बचपन से पढ़ती आ रही हूं, आज उनका गांव, उनका घर उनकी धरती को छूकर महसूस कर सकूंगी। उसने उलट कर मुझसे सवाल किया- आपको कैसा महसूस हो रहा है? टैक्सी के बैक मिरर में उसने मेरा अक्स देखा। “किसी सोच में डूब गए हैं सर?” कुछ देर बाद उसने मुझसे पूछा। “अपने लड़कपन में देखे सपने को आज 40 साल बाद सच होते देख रहा हूँ।” मैंने जवाब दिया।
महान रूसी रंग निर्देशक स्टेनस्लावस्की लड़कपन से मेरे आदर्श निर्देशक रहे हैं। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत के तथाकथित आधुनिक यूरोप के मेलोड्रामाई रंगमंच के बरख़िलाफ़ उन्होंने एक ऐसे आधुनिक रंगकर्म की स्थापना की जिसे आज तक दुनिया का थिएटर और हॉलीवुड सहित सारे संसार का फ़िल्म जगत ‘फॉलो’ करता है। अपनी युवावस्था में, अपने नाट्य निर्देशन की यात्रा की शुरुआत के दौर में, जब युवा मन ख़ूब-ख़ूब काम करता है और सोते-जागते में सपने भी ख़ूब-ख़ूब देखता है।


उन्हीं दिनों मैंने पहली बार स्टेनस्लावस्की की जीवनी पढ़ी। यह वृतांत चेख़व के साथ हुई स्टेनस्लावस्की की पहली मुलाकात का है। वह चेख़व की अमर कृति ‘सीगल’ को सफलता पूर्वक खेल चुके थे और अब ‘अंकल वान्या’ को खेलने के अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। चेख़व इसके लिए तैयार होते नहीं दिख रहे थे क्योंकि वह इनके काम से वाक़िफ़ नहीं थे। उन्हीं दिनों वह मास्को आये। वह खासे बीमार थे। तय हुआ कि निकीत्सी थिएटर में ‘सीगल’ की एक विशेष प्रस्तुति आयोजित की जाय जिसमें सिर्फ लेखक ही एकमात्र दर्शक हो। उन्हें नाटक पसंद तो आया लेकिन उन्होंने उसमें खासी कमियां भी गिना दीं। बकौल स्टेनस्लावस्की, “हमारी बखिया उधेड़ डाली।” उन दिनों मैं कल्पना करने लगता कि मेरी प्रस्तुति में भी हमारा लेखक मौजूद हो। एकाध बार ऐसी स्थितियां बनीं भी लेकिन किसी न किसी वजह से सिरे नहीं चढ़ सकीं।
बात हंसने की नहीं और और न किसी की किसी तुलना की है, बात सपनों की है और सपने प्रतिबंधित नहीं किए जा सकते। लमही की राह पर सरपट भागते कभी लगता जैसे सातवें आसमान के उस पार से वह हमें देख रहे हैं, हम पर चौकन्नी नज़र रखे हैं। काश वह हमारी आज की प्रस्तुति देख सके होते, हमारी पीठ ठोंकते याकि हमारी बखिया उधेड़ते! कभी लगता कि हमारे बीच नहीं हैं इसीलिये हमारी ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ जाती हैं। उन्हें बेदख़ल किए जाने की घिनौनी साज़िशों के बीच उन्हें सहेज कर रखने का दायित्व बोध और भी विकराल हो जाता है। हमारे लिए प्रेमचंद के गांव जाने के यही मायने हैं ।

(अनिल जी ने अपने ये अनुभव अपने फेसबुक पेज पर शेयर किए हैं)

इस पूरे कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने के लिए अमर उजाला के इस लिंक पर क्लिक कीजिए —

http://epaper.amarujala.com/vc/20171009/09.html?format=img

Posted Date:

October 12, 2017 5:41 pm

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